संजीवनी टुडे

फिर दिखा चीन का चालबाज चेहरा

सियाराम पांडेय शांत

संजीवनी टुडे 14-03-2019 17:08:50


संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चौथी बार जिस तरह चीन ने मौलाना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित होने से बचाया है, उससे उसकी नीति और नीयत का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि चीन के दिल में भारत के प्रति कितनी नफरत और कड़वाहट है। नीति कहती है कि सांप को कितना भी दूध पिलाया जाय, लेकिन उसके जहर में कोई कमी नहीं आती। अलबत्ता वह बढ़ता ही है। 'पयः पान भुजगांनां केवलं विषबर्धनम।' चीन ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपने वीटो का इस्तेमाल कर आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित नहीं होने दिया। जब तक चीन के पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार है, तब तक वह पाकिस्तान और उसकी गोद में पल रहे आतंकी संगठनों का बाल बांका नहीं होने देगा। चीन के इस रवैये से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में चीन के खिलाफ आक्रोश है। जो लोग इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की विफलता करार दे रहे हैं, उन्हें इतना तो सोचना होगा कि आतंकवादियों के समर्थन के मुद्दे पर पाकिस्तान ही नहीं, चीन भी दुनियाभर में अलग-थलग पड़ रहा है। 

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यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक विजय है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों ने कहा है कि वे इस मुद्दे पर कोई बड़ा और कड़ा निर्णय लेंगे। यह बड़ा और कड़ा निर्णय क्या होगा, यह तो नहीं पता, लेकिन बाकी के देशों को चीन को वीटो के अधिकार से वंचित करने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। संभव हो तो वीटो को लेकर बहुमत के सिद्धांत पर अमल करना चाहिए। कोई एक देश अपनी हठधर्मिता के चलते अन्य वीटो रखने वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की भावनाओं पर भारी पड़ जाए, यह तो तानाशाही है। इस प्रवृत्ति पर अविलंब रोक लगाए जाने की जरूरत है। चीन को सबक सिखाने के लिए भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों को उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाना चाहिए। चीन से व्यापार पर जब तक रोक नहीं लगेगी, तब तक वह इसी तरह की हरकतें कर पूरी दुनिया को परेशान करता रहेगा। पुलवामा हमले के बाद भारत पहले ही एयर स्ट्राइक कर मसूद अजहर के बालाकोट स्थित ठिकाने को तहस-नहस कर चुका है। मसूद अजहर और उसके आतंकी संगठन को नेस्तनाबूंद करने की दिशा में भारत को ही कुछ करना है। विश्व के देशों का नैतिक समर्थन ही काफी है। भारत को अपना बल प्रकट करना होगा। इस राह में अगर चीन रोड़ा बनता है तो उसे भी सबक सिखाना होगा।

मसूद अजहर को लेकर चीन ने एक बार फिर अपना असली चेहरा दिखा दिया है। अब संयुक्त राष्ट्र संघ को सोचना है कि चीन जैसे देश का वीटो पावर वापस कैसे हो? शांतिप्रिय देश भारत को चीन के बराबर का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का दर्जा कैसे मिले, इस बाबत भी दुनिया के देशों को गंभीरता से विचार करना होगा। मसूद अजहर के चीन के वीटोजन्य बचाव से सभी गुस्से में हैं। चीन ने यह पहली बार नहीं किया है। इससे पहले भी भारत जब-जब मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव लेकर संयुक्त राष्ट्र गया है, तब-तब चीन ने भारत के किये-कराये पर पानी फेरा है। इस बार तो भारत में लोग इतने गुस्से में हैं कि आईपीएल न देखने की सोशल मीडिया पर अपील कर रहे हैं, क्योंकि इस आईपीएल में कई चीनी कंपनियां प्रायोजक हैं।

पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर हुए आत्मघाती हमले के बाद पाकिस्तान के साथ क्रिकेट नहीं खेलने का लेकर भी भारत में दबाव बना हुआ है। लोगों की राय है कि सरकार को चीनी उत्पादों पर भी रोक लगानी चाहिए। उनका बहिष्कार करना चाहिए। जब तक चीन आतंकवाद को संरक्षण दे रहा है तब तक हमें चीन के मोबाइल फोन नहीं खरीदने चाहिए। सोशल मीडिया पर लोग कई चीनी मोबाइल कंपनियों वीवो, ओप्पो ,हूवाई, रेडमी, वन प्लस, जीओनी के उत्पाद न खरीदने की अपील कर रहे हैं। उनका आग्रह है कि चीन को सबक सिखाओ और उसकी अर्थव्यवस्था को ऐसा झटका दो कि उसकी अक्ल ठिकाने आ जाए। चीन पूरी दुनिया में निर्यात कर जितना पैसा कमाता है, उसका 50 प्रतिशत अकेले भारत से कमाता है। भारत अपने बल पर चीन की 50 प्रतिशत कमाई तो रोक ही सकता है। चीनी उत्पादों पर रोक लगाकर वह एक झटके में अपने 12 लाख लोगों को रोजगार से जोड़ सकता है।

सुरक्षा परिषद के एक डिप्लोमेट ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर चीन इस प्रस्ताव को रोकने की नीति जारी रखता है तो अन्य जिम्मेदार सदस्य सुरक्षा परिषद में अन्य एक्शन लेने पर मजबूर हो सकते हैं। ऐसी स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए। अब इस तरह की स्थिति उत्पन्न हो गई है। ऐसे में सुरक्षा परिषद को चीन के विकल्प पर विचार करना चाहिए। जो देश आतंकियों का हमदर्द है, वह दुनिया में शांति और सौहार्द का, उसकी सुरक्षा का हिमायती कैसे हो सकता है? भारत के लिए यह बड़ी बात है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अन्य 4 स्थायी सदस्य अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस उसके साथ खड़े हैं। सुरक्षा परिषद के जिम्मेदार सदस्यों ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वह अपनी इस नीति पर कायम रहता है तो अन्य कार्रवाइयों पर विचार किया जा सकता है। अमेरिका ने तो यहां तक कहा है कि सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध सूची को अपडेट कराने के लिए हमारे प्रयास जारी रहेंगे। भारत ने अमेरिका और फ्रांस के साथ पुलवामा आतंकी हमले के बाद कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज शेयर किए थे, ताकि मसूद के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश किया जा सके। फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की '1267 अल कायदा सेंक्शन्स कमिटी' के तहत अजहर को आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव 27 फरवरी को पेश किया था।

ड्रैगन का 'मसूद प्रेम' अकारण नहीं है। इसके पीछे उसके अपने राजनीतिक और आर्थिक हित हैं। चीन के पास मित्र देशों की संख्या घटती जा रही है। ले-देकर पाकिस्तान ही है जो मजबूरी में उसके साथ खड़ा है। 'इनके और, न उनके ठौर' वाली स्थिति है। वैसे भी कोई देश किसी दूसरे देश का तब तक सहयोग नहीं करता जब तक कि उसके अपने हित न हों।

मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित न होने देने के पीछे चीन के कई बड़े हित निहित हैं। चीन को पता है कि हाफिज सईद के बाद अगर भारत मसूद अजहर को भी संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में शामिल करवाने में सफल हो गया तो वह पाकिस्तान को आतंकवाद प्रायोजित राष्ट्र घोषित कराने में बहुत हद तक सफल हो जाएगा। ऐसी स्थिति में अमेरिका समेत पश्चिमी देश पाकिस्तान पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगा देंगे, जिससे पाकिस्तान के लिए राजनीतिक और आर्थिक मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। इनसे चीन पर भी खास असर पड़ेगा। पाकिस्तान में चीन 50 अरब डॉलर से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बना रहा है। चीन को डर है कि अगर उसने मसूद और पाकिस्तान की पैरवी नहीं की तो यह भारी भरकम निवेश डूब सकता है। पाकिस्तान के दिवालिया होने का मतलब है कि चीन की आर्थिक रूप से कमर टूट जाएगी। विश्व मंच पर मसूद का समर्थन करने का मतलब है कि जैश-ए-मोहम्मद जैसे गुट उसके और पाकिस्तान सरकार के ही खिलाफ हो सकते हैं। जैश-ए-मोहम्मद का कुछ ऐसा इतिहास है भी। 2002 में जब पाकिस्तान सरकार ने जैश पर प्रतिबंध लगाया था तो उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति मुशर्रफ तक पर कई हमले हुए थे। पाकिस्तान में स्थिति संभालनी मुश्किल हो गई थी।


अगर चीन की हां से मसूद अजहर वैश्विक आतंकी घोषित हो जाता, तो पाकिस्तान को मसूद के खिलाफ और उससे जुड़े संगठनों पर कड़ी कार्रवाई करनी पड़ती। मसूद अजहर और उसके संगठन को पूरी तरह अलग-थलग करना पड़ता। मसूद अजहर के आतंकी शिविरों और उसके मदरसों को बंद करना पाकिस्तान की विवशता हो जाती। चीन भी भारत का उतना ही बड़ा शत्रु है जितना कि पाकिस्तान। चीन को डर है कि पाकिस्तान को काबू करने के बाद भारत का प्रयास चीन द्वारा हड़पी गई अपनी जमीन को छुड़ाना होगा। भारत में नरेंद्र मोदी को स्थानीय राजनीतिक विवादों में फंसाये रखना भी चीन की चाल का एक हिस्सा है।

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लेकिन इस बात को विपक्ष समझ नहीं पा रहा है। डोकलाम में महीनेभर जिस तरह भारतीय सैनिकों ने चीन की निर्माण साजिशों को रोका, उससे चीन डरा हुआ है। नरेंद्र मोदी जिस दृढ़ता के साथ उसे चुनौती दे रहे हैं, वह साहस की बात है। चीन से भारत को कभी भी सदाशयता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। शत्रु अगर मित्र हो जाए तो भी उस पर सहजता से विश्वास नहीं किया जा सकता। वह पीठ पीछे वार करने वाला देश है। भारत -चीन भाई-भाई के नारे को पलीता लगाने वाला देश है। उसे रोकने और सबक सिखाने का एक ही तरीका है कि भारत चीन के उत्पादों का बहिष्कार करे। इसके लिए केवल सरकार को नहीं, हर भारतीय को सोचना होगा कि वह चीन का कोई सामान न खरीदें। भारतीय दुकानदारों को भी चीन का सामान मंगाने और उसे बेचने से खुद को रोकना होगा। जब आर्थिक चोट लगती है तो अच्छे-अच्छों के होश ठिकाने आ जाते हैं। चीन भला किस खेत की मूली है। 

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