संजीवनी टुडे

पढ़िए, रहीम के दोहे अर्थ सहित

संजीवनी टुडे 19-06-2017 12:27:34

 

खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय। 
रहिमन करुए मुखन को, चाहिए यही सजाय।।

अर्थ : खीरे का कडुवापन दूर करने के लिए उसके ऊपरी सिरे को काटने के बाद नमक लगा कर घिसा जाता है। रहीम कहते हैं कि कड़ुवे मुंह वाले के लिए – कटु वचन बोलने वाले के लिए यही सजा ठीक है। 

दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं। 
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं।।

अर्थ : कौआ और कोयल रंग में एक समान होते हैं। जब तक ये बोलते नहीं तब तक इनकी पहचान नहीं हो पाती।लेकिन जब वसंत ऋतु आती है तो कोयल की मधुर आवाज़ से दोनों का अंतर स्पष्ट हो जाता है। 


रहिमन अंसुवा नयन ढरि, जिय दुःख प्रगट करेइ। 
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ ।। 

अर्थ : रहीम कहते हैं की आंसू नयनों से बहकर मन का दुःख प्रकट कर देते हैं। सत्य ही है कि जिसे घर से निकाला जाएगा वह घर का भेद दूसरों से कह ही देगा।

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय। 
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय।। 

अर्थ : रहीम कहते हैं की अपने मन के दुःख को मन के भीतर छिपा कर ही रखना चाहिए। दूसरे का दुःख सुनकर लोग इठला भले ही लें, उसे बाँट कर कम करने वाला कोई नहीं होता।

पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन। 
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछे कौन।। 

अर्थ : वर्षा ऋतु को देखकर कोयल और रहीम के मन ने मौन साध लिया है. अब तो मेंढक ही बोलने वाले हैं। हमारी तो कोई बात ही नहीं पूछता। अभिप्राय यह है कि कुछ अवसर ऐसे आते हैं जब गुणवान को चुप रह जाना पड़ता है। उनका कोई आदर नहीं करता और गुणहीन वाचाल व्यक्तियों का ही बोलबाला हो जाता है।

रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय। 
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय।। 

अर्थ : रहीम कहते हैं कि यदि विपत्ति कुछ समय की हो तो वह भी ठीक ही है, क्योंकि विपत्ति में ही सबके विषय में जाना जा सकता है कि संसार में कौन हमारा हितैषी है और कौन नहीं।

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग। 
बांटन वारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग।। 

अर्थ : रहीम कहते हैं कि वे लोग धन्य हैं जिनका शरीर सदा सबका उपकार करता है। जिस प्रकार मेंहदी बांटने वाले के अंग पर भी मेंहदी का रंग लग जाता है, उसी प्रकार परोपकारी का शरीर भी सुशोभित रहता है।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात। 
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात।। 

अर्थ : रहीम कहते हैं कि उपयुक्त समय आने पर वृक्ष में फल लगता है। झड़ने का समय आने पर वह झड़ जाता है। सदा किसी की अवस्था एक जैसी नहीं रहती, इसलिए दुःख के समय पछताना व्यर्थ है।

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग। 
बांटन वारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग।। 

अर्थ : रहीम कहते हैं कि वे लोग धन्य हैं जिनका शरीर सदा सबका उपकार करता है. जिस प्रकार मेंहदी बांटने वाले के अंग पर भी मेंहदी का रंग लग जाता है, उसी प्रकार परोपकारी का शरीर भी सुशोभित रहता है।

ओछे को सतसंग रहिमन तजहु अंगार ज्यों। 
तातो जारै अंग सीरै पै कारौ लगै।।

अर्थ : ओछे मनुष्य का साथ छोड़ देना चाहिए. हर अवस्था में उससे हानि होती है – जैसे अंगार जब तक गर्म रहता है तब तक शरीर को जलाता है और जब ठंडा कोयला हो जाता है तब भी शरीर को काला ही करता है।

वृक्ष कबहूँ नहीं फल भखैं, नदी न संचै नीर। 
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।

अर्थ : वृक्ष कभी अपने फल नहीं खाते, नदी जल को कभी अपने लिए संचित नहीं करती, उसी प्रकार सज्जन परोपकार के लिए देह धारण करते हैं। 

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