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पूरी दुनिया में 9 अगस्त को बड़ी धूमधाम से मनाया जाएगा 'विश्व आदिवासी दिवस'

संजीवनी टुडे 08-08-2020 21:58:14

पूरी दुनिया में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाएगा।


जयपुर। पूरी दुनिया में 9 अगस्त को 'विश्व आदिवासी दिवस' बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाएगा। इसके लिए आदिवासी समाज ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं हालांकि कोरोना संक्रमण के चलते बड़े सामाजिक आयोजन नहीं कर पाएंगे। भारत सरकार के 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक, राजस्थान में आदिवासी वर्ग के लोगों की संख्या राजस्थान की कुल आबादी का 12.6% (86 लाख) है।

उल्लेखनीय है कि 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी लोग धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। आदिवासी समाज के लोग इस दिन को आदिवासी परंपराओं और रीति-रिवाजों के उत्सव के रूप में मनाते हुए अपने देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं तथा सामाजिक उत्सव के रूप में सामूहिक रूप से खुशियों का इजहार करते हैं।

आदिवासी दो शब्दों यानी 'आदि' और 'वासी' से मिल कर बना होता है।  इसके अर्थ की बात करें तो इसका मतलब मूल निवासी होता है।  बता दें कि हमारे देश भारत की जनसंख्या का 8.6% (10 करोड़) के बराबर एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है. आदिवासियों को पुरातन लेखों में अत्विका और वनवासी भी कहा गया है। 

जानकारी के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र संघ ने 9 अगस्त 1982 को आदिवासियों के हित में एक विशेष बैठक आयोजित की थी। तब से इस तारीख को 'विश्व आदिवासी दिवस' के रूप में मनाया जाने लगा। देश के विभिन्न राज्यों में आदिवासी आबादी के हिस्से के बारे में आप भी पढ़ें- 
हरियाणा  0.00 %
उत्तर प्रदेश 0.07 %
बिहार 0.99 %
पश्चिम बंगाल 5.49 %
झारखंड 26.2 %
शिक्किम 33.08%
त्रिपुरा 31.08 %
असम 12.04 %
मेघालय 86.01%
मिजोरम 94.04 %
नगालैंड 86.05 %
मनीपुर 35.01 %
अरूणाचल 68.08 %

बता दें कि भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए 'अनुसूचित जनजाति' पद का प्रयोग किया गया है. देश के प्रमुख आदिवासी समुदायों में बोडो, भील, उरांव, परधान, खासी, सहरिया, संथाल, मीणा, जाट, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, बिरहोर, पारधी, आंध, मल्हार कोली, टाकणकार, टोकरे कोली और महादेव कोली आदि शामिल हैं। 

विश्व आदिवासी दिवस के दिन आदिवासी लोग अपने घरों और खेतों में खास तरह का झंडा लगाते हैं, जो अन्य धर्मों के झंड़ों से एकदम अलग होता है। आपको बता दें कि आदिवासी किसी मूर्ति के बजाय जीव-जंतुओं, नदियो, खेत और पर्वत आदि प्राकतिक चीजों की पूजा करते हैं।

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