संजीवनी टुडे

उत्तराखण्ड के दो निकाय चुनाव भाजपा-कांग्रेस के लिए बनेगी दिलचस्प

संजीवनी टुडे 09-06-2019 21:48:33

उत्तराखण्ड के श्रीनगर और बाजपुर नगर पालिका परिषदों के निकाय के प्रमुखों की कुर्सी पर भाजपा कांग्रेस की अंदरखाने तैयारी शुरू हो गई है। वहीं भाजपा के दो मंत्रियों की गृह क्षेत्र में चुनाव होने से कांग्रेस के लिए चुनौती से कम नही है


देहरादून। उत्तराखण्ड के श्रीनगर और बाजपुर नगर पालिका परिषदों के निकाय के प्रमुखों की कुर्सी पर भाजपा कांग्रेस की अंदरखाने तैयारी शुरू हो गई है। वहीं भाजपा के दो मंत्रियों की गृह क्षेत्र में चुनाव होने से कांग्रेस के लिए चुनौती से कम नही है। दोनों दल अपनी संख्या बल बढ़ाने में कोई कसर नही छोड़ेंगे। सरकार की मंशा हाईकोर्ट के आदेशानुसार 15 जुलाई से पहले दोनों जगह चुनाव करा देने की है। 

श्रीनगर और बाजपुर नगर पालिका परिषदों के चुनाव के लिए तैयारी तेज हो गई है। निर्वाचन आयोग की अपनी तैयारियां हैं, लेकिन दल भी चुनावी चुनौती के लिए चौकन्ने होने लगे हैं। दोनों ही निकायों के चुनाव दिलचस्प होने की उम्मीद है। इसकी वजह ये है कि त्रिवेंद्र सरकार के दो मंत्रियों यशपाल आर्य और धन सिंह रावत के गृह क्षेत्र में यह चुनाव होगा, जहां न चाहते हुए भी दोनो मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर रहेगी। वर्ष 2018 में हुए निकाय चुनाव में नगर प्रमुखों के पदों पर भाजपा ने 35, तो कांग्रेस ने 25 जगह जीत हासिल की थी। दो निकाय के प्रमुखों की कुर्सी पर कब्जा करके भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस संख्या को और बढ़ाना चाहेंगे।

शहरी विकास विभाग ने श्रीनगर नगर पालिका अध्यक्ष की सीट को महिला आरक्षित घोषित किया है, जबकि बाजपुर सामान्य सीट रहेगी। संबंधित अधिसूचना पर आज कल आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए गए हैं। एक सप्ताह पूरा होते ही दोनों सीटों के आरक्षण पर अंतिम अधिसूचना जारी कर दी जाएगी।

यशपाल आर्य और धन सिंह रावत को चुनाव में ताकत लगानी पड़ेगी। समाज कल्याण मंत्री यशपाल आर्य बाजपुर से विधायक हैं। इसी तरह उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत श्रीनगर का विधानसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं। दोनों मंत्रियों की भूमिका इसलिए अहम हो जाती है। 

 कि 2018 में हुए निकाय चुनाव में सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के गृह क्षेत्र डोईवाला में भाजपा चुनाव हार गई थी। इसी तरह, वन मंत्री डा हरक सिंह रावत कोटद्वार और शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक हरिद्ववार में भाजपा की नाव को पार नहीं लगा पाए थे। श्रीनगर के भंग बोर्ड में अध्यक्ष निर्दलीय थे, जबकि बाजपुर में कांग्रेस के खाते में अध्यक्ष की सीट रही थी।

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