संजीवनी टुडे

मुम्बई से लौटे प्रवासी की व्यथा, परदेश में नहीं दिया किसी ने साथ, आखिर अपनों ने ही बढ़ाया हाथ

संजीवनी टुडे 25-05-2020 17:16:35

अपनी जन्मभूमि से दूर जाकर बहुत ही सपने पाल रखे थे, बहुत कुछ पूरा होने की ओर अग्रसर भी था। अब धंधा भी चल निकला था लेकिन कोरोना रूपी महामारी ने यह सीख दे दी कि धंधा थोड़ा कम चले या ज्यादा अपनत्व तो अपनों के बीच ही मिल सकता है। एक महामारी आयी नहीं कि वहां जो अपने थे वे भी पराए होने लगे।


सुल्तानपुर। अपनी जन्मभूमि से दूर जाकर बहुत ही सपने पाल रखे थे, बहुत कुछ पूरा होने की ओर अग्रसर भी था। अब धंधा भी चल निकला था लेकिन कोरोना रूपी महामारी ने यह सीख दे दी कि धंधा थोड़ा कम चले या ज्यादा अपनत्व तो अपनों के बीच ही मिल सकता है। एक महामारी आयी नहीं कि वहां जो अपने थे वे भी पराए होने लगे। अब तो इस जन्मभूमि पर ही कामधंधा शुरू करेंगे। कहीं दूर जाना नहीं है। यहां आते ही ऐसा लगा जैसे मां की गोद में पुन: आ गये हैं और हर तरफ से लोगों ने हाथ बढ़ाना शुरू कर दिया।  

ये बातें कहीं नगर के अमहट निवासी पिंटू ने, जो अपना घर बार छोड़कर पहली बार 2008 मुम्बई गए थे । पहले गारमेंट का काम सीखा फिर अपना काम शुरू किया। फिर दुकान से कपड़े लेकर घर की महिलाओं से कपड़ों का काम करवाता था। इस प्रकार एक अच्छा कारोबार चल पड़ा था। महीने के लगभग तीस हजार रुपए की बचत हो जाती थी। अपने बीवी बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहा था। पत्नी संतोष साहू भी काम में सहयोग करती थी। दो बेटे चेतन एवं मयंक भी स्कूल जाने लगे थे। बातें करते-करते पिंटू आंखे आंसू से भर आयी। वह बताता है कि पेट जो न करा दे लेकिन अपना घर तो अपना ही होता है। ममत्व का प्यार अपनी ही धरती दे सकती है। कोरोना काल में यह समझ में आ गया। अब हमें कहीं नहीं जाना है।

हिन्दुस्थान समाचार से अपनी कथा- व्यथा बताते हुए पिंटू ने कहा कि लॉक डाउन के दौरान काम पूरी तरह से बंद हो गया। काम करने वाली अधिकांश महिलाएं भी शहर छोड़ कर गांव चली गई। एक तरफ महिलाओं के घरों में कपड़े फंस गए तो दूसरी तरफ तरफ सेठ की दुकानों पर पूंजी फंस गयी, जिसके कारण तीन से चार लाख का नुकसान उठाना पड़ गया। अंत में जो कमाया था  दो महीने में खा पीकर बराबर किया। अभी चार दिन पहले वापस घर आया हूं।

घर का किराया गाड़ी की किस्त, एक बड़ी समस्या
उन्होंने बताया कि अब आगे की समस्या कमरे का किराया, गाड़ी की ईएमआई कहां से भरेंगे समझ में नहीं आ रहा है। पूर्ण बंदी के दौरान मुंबई में सरकार के द्वारा किसी भी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिली ना ही कोई पूछने वाला था। अपने यहां सुल्तानपुर पहुंचते ही गनपत सहाय स्कूल में बकायदा चेकिंग हुई, उसके बाद राशन किट भी मिला, बस सिर्फ मलाल है तो इतना कि हम अपनी माँ एवं भैया, भाभी वाले परिवार के बिना रह कर अलग एकांतवास में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसके बावजूद भी अपने घर पहुँचकर बड़ा सकून मिला है। 

अब यही पर कुछ सहायता मिल गयी तो काम धंधा जमाएंगे 
कुछ अच्छा काम यहां पर बनेगा तो अब यही अपना काम शुरू करेंगे परदेस से अच्छा अपनी जन्म भूमि है। सरकार से थोड़ी भी बहुत सहायता मिल गयी तो यहीं पर अपना काम धंधा अच्छे से जमाने की कोशिश करेंगे।

यह खबर भी पढ़े: महिला को अगवा कर गैंगरेप का प्रयास, पुलिस ने बचाई अस्मत

ऐसी ही ताजा खबरों व अपडेट के लिए डाउनलोड करे संजीवनी टुडे एप

More From state

Trending Now
Recommended