संजीवनी टुडे

रक्षाबंधन के मौके पर इस खेला जाएगा अद्भुत बग्वाल

इनपुट- यूनीवार्ता

संजीवनी टुडे 14-08-2019 15:03:43

रक्षाबंधन के पावन मौके पर जहां देश में भाई बहन के पवित्र त्योहार रक्षाबंधन मनाया जाता है वहीं उत्तराखंड का एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां गुरुवार को इस मौके पर अद्भुत बग्वाल (पाषाण युद्ध) खेला जाएगा।


नैनीताल। रक्षाबंधन के पावन मौके पर जहां देश में भाई बहन के पवित्र त्योहार रक्षाबंधन मनाया जाता है वहीं उत्तराखंड का एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां गुरुवार को इस मौके पर अद्भुत बग्वाल (पाषाण युद्ध) खेला जाएगा। 

राज्य में कुमाऊं मंडल के चंपावत जनपद के देवीधूरा स्थित ऐतिहासिक खोलीखाण मैदान में रक्षाबंधन के मौके पर बग्वाल खेला जायेगा। हमेशा की तरह इस बार भी इस अद्भुत क्षण के साक्षी लाखों लोग रहेंगे। बग्वाल के लिये खोलीखाण मैदान सज गया है। प्रशासन की ओर से भी सभी तैयारियां पूरी ली गयी हैं। बग्वाल को असाड़ी कौतिक के नाम से भी जाना जाता है। 

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असाड़ी कौतिक कई दिनों तक चलता है लेकिन इसका मुख्य आकर्षण रक्षा बंधन के मौके पर खेली जानी वाली बग्वाल होती है। यह अद्भुत खेल चार खामों एवं सात थोकों के मध्य खेला जाता है। पौराणिक काल से खेली जा रही बग्वाल को कुछ जानकार कत्यूर शासन का पारंपरिक त्योहार बताते हैं जबकि कुछ इसे काली कुमाऊं से जोड़ कर देखते हैं।

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प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पौराणिक काल में कुमाऊं के चमियाल, गहड़वाल, लमगड़िया एवं बालिग खामों में अपनी आराध्य बाराही देवी को मनाने के लिए नर बलि देने की प्रथा थी। चारों खामों से हर साल एक नर बलि दी जाती थी। एक समय चमियाल खाम की एक वृद्धा के परिवार की ओर से नर बलि दी जानी थी। परिवार में वृद्धा एवं उसका पौत्र ही जीवित थे। अपने पौत्र की रक्षा के लिये वृद्धा ने मां बाराही की स्तुति की। तभी से बग्वाल खेलने की परंपरा शुरू हुई।

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बग्वाल बाराही मंदिर के खोलीखांण मैदान में खेली जाती है। लमगड़िया एवं बालिग खामों के रणबांकुरे एक तरफ जबकि गहड़वाल एवं चमियाल खाम के रणबांकुरे दूसरी ओर डटे रहते हैं। रक्षाबंधन के दिन सभी रणबांकुरे सबसे पहले सज-धजकर मंदिर परिसर में आते हैं। देवी की आराधना के साथ शुरू हो जाता है अद्भुत खेल बग्वाल। माना जाता है कि बग्वाल तब तक खेली जाती है जब तक एक आदमी के बराबर खून न बह जाये। इस खेल के दौरान पहले फूल एवं फल आपस में चलाये जाते हैं। इसके बाद होता है पत्थरों बरसाये जाते हैं। इस दौरान असीमित पत्थर एक दूसरे पर फेंके जाते हैं।

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पुजारी की सहमति के बाद बग्वाल रोक दी जाती है। अंत में दोनों पक्ष एक दूसरे से गले मिलते हैं। एक-दूसरे को आशीष देते हैं एवं मंगलकामनाएं करते हैं। इस दौरान कुछ लोग घायल हो जाते हैं। उनके लिये प्रशासन की ओर से मेडिकल कैम्प की व्यवस्था रहती है। हालांकि मान्यता है कि इस खेल में कोई गंभीर रूप से घायल नहीं होता है। 

बग्वाल मेला कमेटी के अध्यक्ष खीम सिंह लमगड़िया, भुवन चंद्र जोशी एवं कीर्ति वल्लभ जोशी के अनुसार बग्वाल के लिए तन एवं मन की शुचिता आवश्यक है। तामसिक चीजों से दूर रहना पहली शर्त होती। इस ऐतिहासिक मौके पर यहां का हर प्रवासी बग्वाल के लिये देवीधूरा पहुंचता है। अगले दिन मां की शोभायात्रा के साथ असाड़ी कौतिक खत्म हो जाता है। 

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जोशी ने बताया कि इस वर्ष का बग्वाल मेला सांगी पूजन के साथ शुरू हो गया है। इस अवसर पर लगने वाला मेला कई दिनों तक चलेगा। इसकी लोकप्रियता बढ़ाने के लिये प्रशासन ने खेल गतिविधियां एवं लोगों के मनोरंजन के लिये कई चीजें बढ़ा दी हैं। बग्वाल को सफल बनाने के लिये प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है। 

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