संजीवनी टुडे

बिहार में इस बार भी नोटा का मतदाताओं ने जम कर किया इस्तेमाल

संजीवनी टुडे 24-05-2019 21:33:06


पटना| लोकसभा  चुनाव में बिहार में इस बार भी नोटा  का मतदाताओं ने जम कर इस्तेमाल किया. चुनाव आयोग से मिले आकंड़ों के अनुसार इसका सबसे अधिक प्रयोग मतदाताओं ने गोपालगंज लोकसभा सीट पर किया और सबसे कम दरभंगा लोकसभा सीट पर. राज्य की चालीस लोकसभा सीटों में से 13 पर इस विकल्प का मतदाताओं द्वारा इस्तेमाल किये जाने से नोटा इन क्षेत्रों में तीसरे पायदान पर रहा. आकड़ों को देखा जाए तो कुल मतों का दो प्रतिशत इस बार नोटा को मिला. गोपालगंज लोकसभा क्षेत्र में 51660 मतदाताओं ने नोटा विकल्प चुना. यहाँ से जनता दल ( यू) के आलोक कुमार सुमन ने राजद के सुरेन्द्र राम को 286434 मतों से पराजित किया. गोपालगंज के बाद सबसे अधिक 45699 नोटा का इस्तेमाल पश्चिम चंपारण में हुआ जहां उम्मीदवारों के बीच हार -जीत का अंतर 293906 मतों का रहा, जबकि जमुई में 39496 मतदाताओं ने नोटा का प्रयोग किया, समस्तीपुर में 35417 , नवादा में 35147 और दरभंगा में सबसे कम 20468.लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया। 

निर्वाचन आयोग द्वारा पिछले लोकसभा चुनाव से किसी भी उम्मीदवार को वोट न देने की स्थिति को दर्ज करने के लिए मतदाताओं को दिए गए  नोटा के विकल्प का 2014 के लोकसभा चुनाव में भी खूब इस्तेमाल हुआ था . बिहार में 2014 में सबसे ज्यादा नोटा का प्रयोग समस्तीपुर के मतदाताओं ने किया था । इस संसदीय क्षेत्र के 29,211 मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया था. राष्ट्रकवि दिनकर की धरती बेगूसराय 2014 में नोटा के मामले में दूसरे स्थान पर था जहां 26,622 मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया था . इस वर्ष यहाँ मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल नहीं किया. जिन 13 लोकसभा क्षेत्रों में इस बार नोटा का इस्तेमाल हुआ उनमें पश्चिम चंपारण , पूर्वी चंपारण , अररिया, कटिहार , दरभंगा , गोपालगंज ,सारण , समस्तीपुर , भागलपुर , आरा , गया, नवादा और जमुई शामिल हैं. शिक्षाविद नवल किशोर चौधरी ने कहा कि प्रत्त्याशियों के प्रति बढ़ता हुआ असंतोष , उनकि पृष्ठभूमि , कुछ उम्मदीवारों की आपराधिक छवि , और पार्टियों की समाप्त होती विचारधारा समाप्त के कारण उनपर मतदाताओं का अविश्वास बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से नोटा का अधिक हो रहा है . उन्होंने कहा कि चुनाव की प्रक्रिया पर उटाह रहे प्रश्न और अविश्वास तथा राजनीतिक व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास उठ रहा है. उन्होंने कहा कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था हाशिये पर रहने वालों , समाज के कमज़ोर तबके के लोगों और बेरोजगारों के मुद्दों को ठीक से देख नहीं रहा है. 

उन्होंने कहा कि आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में पांच साल में एक बार चुनने का मौक़ा मिलता है साथ ही चुनाव करने के लिए राजनीतिक विकल्प भी बहुत ही कम है. इसलिए ऎसी परिस्थिति में मतदाताओं को अपना असंतोष प्रकट करने का नोटा एक विकल्प है जिसका इस्तेमान कर वह अपने असंतोष को प्रकट कर रहे हैं. यह असंतोष किसी एक चीज़ से नहीं बल्कि कहीं उम्मीदवार पसंद नहीं है तो कहीं पार्टी पसंद नहीं है. उन्होंने कहा कि राजनीतिक व्यवस्था और लोकतंत्र वोट तक सिमट कर रह गया है और लोगों के मुद्दों पर कुछ भी कर कर सकने में सक्षम नहीं है . . इस बीच जनता दल (यू ) के प्रवक्ता और विधान पार्षद राजीव रंजन ने कहा कि नोटा के इस्तेमाल का मतलब निर्णय लेने की क्षमता का नहीं होना है. संविधान की धारा 325-326  के तहत मिले वोट के अधिकार का नोटा दुरुपयोग है. नोटा का इस्तेमाल करनेवालों के मतदान करने के अधिकार पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि इसका इस्तेमाल कर मतदाता  चुनौती दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि नोटा का इस्तेमाल नई पीढ़ी के लोग कर रहे हैं जिनको सामाजिक परिस्थिति की समझ नहीं है. उन्होंने कहा कि यदि नोटा का प्रयोग मतदाता करते हैं तो उन्हें वोट करने का अधिकार क्यों दिया जाए ,इस पर चुनाव आयोग को विचार करना होगा. 

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पिछले लोकसभा चुनाव में नोटा के इस्तेमाल के मामले में बिहार देश में तीसरे स्थान पर था और यहाँ के कुल 3 करोड़ 58 लाख 92 हजार 452 मतदाताओं में से 5 लाख 80 हजार 964 मतदाताओं ने ईवीएम में नोटा का बटन दबाया था. नोटा का सबसे अधिक इस्तेमान समस्तीपुर मैं हुआ था और सबसे कम कटिहार में. आकड़ों के अनुसार कटिहार में 3,287, पाटलिपुत्र में 4,678 और नालंदा में 5,452 मतदाताओं ने नोटा का प्रयोग किया किया था । बेगूसराय के 26,622 और खगड़िया के 23,868 मतदाताओं ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नोटा का इस्तेमाल किया था । 2014 में देश भर में 55.41 करोड़ वोट डाले गए थे जिसमें, से 60 लाख 2 हजार 942 मतदाताओं ने नोटा का प्रयोग किया था . लोकसभा के 2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने सबसे ज्यादा नोटा का प्रयोग किया। उसके बाद तमिलनाडु और तीसरे स्थान पर बिहार के मतदाताओं ने नोटा का प्रयोग किया।

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