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...तब शहीद होने की आयी थी खबर, अब चीन से लड़ने को तैयार हैं रिटायर्ड फौजी संग्राम सिंह

संजीवनी टुडे 01-07-2020 14:44:31

28 जून 1995, बड़गाम जिला (कश्मीर)। तकरीबन 25 बरस पीछे की इस घटना को याद कर सेना के रिटायर्ड जवान संग्राम सिंह गर्व से भर उठते हैं।


बलिया। 28 जून 1995, बड़गाम जिला (कश्मीर)। तकरीबन 25 बरस पीछे की इस घटना को याद कर सेना के रिटायर्ड जवान संग्राम सिंह गर्व से भर उठते हैं। वे दुनिया के किसी भी पुरस्कार को शहीद होने से बड़ा नहीं मानते।

शहर के टैगोर नगर में रह रहे सेवानिवृत्त फौजी संग्राम सिंह गलवान की घटना को लेकर कई दिनों से उद्वेलित हैं। चीन के साथ लड़ने को तैयार हैं। गलवान का जिक्र आते ही, इस संग्राम सिंह ने अपनी आपबीती बताई तो रोंगटे खड़े हो गए। 

संग्राम सिंह बताते हैं कि उस दिन बड़गाम के एक घर में तकरीबन 32 आतंकवादियों के छिपे होने की सूचना मिली थी। 34 राष्ट्रीय रायफल्स की दस-दस सैनिकों की चार टोलियां ऑपरेशन के लिए तत्काल निकलीं। मैं भी एक टोली का अहम हिस्सा था। हमारी टोली पर आतंकवादियों ने अचानक फायर झोंक दिया। उस वक्त दूसरी टोलियां आसपास के क्षेत्रों में सर्च कर रहीं थीं। 

कहा कि आतंकवादियों के इस अचानक हमले को मैं व मेरे साथी जब तक भांप पाते, तब तक अंधाधुंध गोलीबारी होने लगी। मेरे तीन साथी शहीद हो गए। जिसमें बलिया के ही चिलकहर के कमल सिंह को 32 गोलियां लगी थीं। वे मौके पर ही शहीद हो गए। इस घटना में संग्राम सिंह को भी पांच गोलियां लगीं थीं। छर्रे तो अनगिनत लगे थे। जिनके निशान संग्राम सिंह के शरीर पर आज भी दिखते हैं। इस हमले में दो अन्य सैनिक भी घायल हुए थे। जवाबी कार्रवाई में एक आतंकी ढेर हुआ था।

आतंकी हमले के बाद बेस अस्पताल पहुंचाए गए संग्राम सिंह को चिकित्सकों ने शहीद घोषित कर दिया। संग्राम सिंह के घर शहीद होने का टेलीग्राम भी कर दिया गया। घर पर अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया था। लेकिन संग्राम सिंह के पिता जी जो खुद भी सेना से ही रिटायर हैं, यह मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने कहा कि मेरे बेटे को कुछ नहीं हुआ है। और बेटे से मिलने निकल पड़े। घटना के आठ दिन बाद श्रीनगर पहुंच गए। इधर, परिवार ईश्वर पर भरोसा रखे हुए था।

शहीद होने की तो सूचना दी, पर जिंदा होने की नहीं
बेटे को अस्पताल में पड़ा देख, संग्राम सिंह के पिता ने अधिकारियों से सवाल किया.... शहीद होने की सूचना तो दे दी, पर बेटा जिंदा है तो इसकी सूचना क्यों नहीं दी। खैर, अधिकारियों ने गलती मानी। संग्राम सिंह के पिता को सकुशल घर पहुंचवाया। उनके आते ही घर पर खुशी का माहौल बन गया। दो माह तक चले इलाज के बाद संग्राम सिंह को एक प्रशंसा पत्र मिला। इस प्रशंसा पत्र के अलावा 26 जनवरी 2011 में गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने को संग्राम सिंह अपने जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार मानते हैं।

जमीन के कंपन से आया था होश
गोली लगने को याद करते हुए संग्राम सिंह बताते हैं कि मैं बेहोश हो गया था। दूसरे साथियों ने रॉकेट लांचर दागे तो जमीन के कंपन से मैं होश में आया। देखा कि कमल सिंह पास में ही गिरे थे। उनके खून के थक्के मेरे शरीर पर भी गिरे थे। मैं खून से सन गया। शायद यही देख आतंकियों ने मुझे मरा समझ लिया और पैरों से ठोक कर आगे बढ़ गए।

कहा कि मैं घिसटकर पास के नाले के पास पहुंचा। किसी तरह नाले का पानी पिया। पुनः बेहोश गया। इसके बाद खुद को अस्पताल में पाया। 28 दिन अस्पताल में रहने के बाद घर आया। इसके बाद अपनी बटालियन हेडक्वार्टर पहुंचा तो मेजर आरएस धारीवाल ने 25 हजार रुपए और एक प्रसंशा पत्र दिया। यह देते वक्त उन्होंने मेरे नाम से पहले जैसे ही प्रिय शब्द का सम्बोधन किया, मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया। वह प्रिय शब्द और प्रशंसा पत्र मेरी सबसे बड़ी पूंजी हैं। संग्राम सिंह कहते हैं कि शहीद होने से बड़ा दुनिया में कोई पुरस्कार नहीं है।

शरीर में पांच गोलियों के निशान देश के प्रति रखते हैं सजग
मेरे शरीर में लगी पांच गोलियों के निशान मुझे देश के प्रति हमेशा सजग रखते हैं। संग्राम सिंह कहते हैं कि मेरा अनुभव यह बताता है.... पाकिस्तानी और चीनी छद्म अटैक करने में माहिर हैं। हालांकि सामने कोई पैर अड़ा दे तो भागने में देर नहीं लगाते। कहते हैं कि चीन को काबू में करना है तो देश को एकजुट होना पड़ेगा। सैनिकों पर भरोसा करना होगा। बोले, मुझे यकीन है कि जवान जब तक हैं, देश हमेशा सुरक्षित है। सरकार यदि याद करेगी तो अब भी हथियार उठाने को तैयार हूं। 

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