संजीवनी टुडे

रामकथा त्रिभुवन की कथा है : मुरारी बापू

संजीवनी टुडे 19-05-2019 16:09:21


डूंगरपुर। मानस मर्मज्ञ मोरारी बापू के श्रीमुख से श्रीराम कथा का शुभारंभ शनिवार से हुआ। खडगदा गोवर्धन विद्या विहार के तत्वावधान में नौ दिन तक चलने वाली श्रीराम कथा में मुख्य विषय मानस कबंध रखा गया है। इसी विषय को केंद्र में रखकर कथा के पहले दिन मोरारी बापू ने मानस के अरण्य काण्ड से चौपाई उद्धत करते हुए मानस के मुख्य असुर पात्रों में से एक कबंध को विषय के लिए चुना और कथारंभ के पहले दिन कबंध के चरित्र तथा वर्तमान जीवन में व्यक्ति को अपनी-अपनी मानसिकता और जीवनशैली के अनुसार कबंध के दर्पण में खुद की शक्ल देखने का मशविरा दिया। मानस के इस असुर पात्र पर प्रवचन करते हुए बापू ने कहा कि कबंध पूर्वजन्म में अत्यंत धनी गंर्धव था लेकिन दुर्वासा के श्राप के कारण उसे असुर बनकर धरती पर आना पड़ा। 

रावण की सीता हरण की योजना के तहत भगवान राम द्वारा सीता की खोज के दौरान शबरी के आश्रम में पहुंचने से पहले कबंध को निर्वाण देने की कथा को रेखांकित किया। बापू ने कहा कि मानस में कुछ असुर पात्र ऐसे है जिन्हें भगवान राम ने आते ही निर्वाण दिया है उनमें ताडका, मारीच और कबंध मुख्य रूप से है। बापू ने कहा कि कबंध राक्षस में सगुण थे तो दुर्गुण भी थे लेकिन उसे अपने पूर्वजन्म की करनी का फल भोगना पड़ा।बापू ने कहा कि  रामकथा केवल एक कहानी नहीं है, ये तो त्रिभुवन की कथा है। कथा की निकटता से दु:ख दूर होते है :- बापू ने मानस की महिमा पर कथा के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि रामायण सुरतरू की छाया है। मानस की कथा की निकटता दु:खों को दूर कर देती है। 

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उन्होंने कथारंभ के पहले दिन गोस्वामी तुलसीदास द्वारा प्रथम सोपान में पंचदेवों की प्रार्थना का उल्लेख किया और कहा कि गोस्वामीजी ने मानस को स्वांतसुखाय श्लोक से लोक भाषा में जन-जन तक पहुंचाया। रामायण का प्रत्येक पात्र और चरित्र प्रेरणास्पद है। वर्तमान जीवन में इन चरित्रों की अत्यंत महिमा है। मानस में विविध चरित्रों का समावेश है फिर भी आदि, मध्य और अंत में भगवान राम का ही प्रतिपादन हुआ है। कथा श्रवण से प्रसन्नता में वृद्धि होती है।  विदेश यात्रा का एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि एक बार एक श्रद्धालु ने उनसे पूछ लिया कि वे किस ग्रुप के है, इस पर उन्होंने कहा कि उनका को ईग्रुप नहीं है लेकिन ब्लड ग्रुप ओ जरूर है जो सब में चलता है। मनोविनोद में ही बापू ने श्रद्धालुओं से कहा कि नौ दिन खूब भजन और भोजन करो। पहले जमाने में भजन बहुत कठिन हुआ करता था लेकिन यहां तो भजन के लिए भी एसी की व्यवस्था है। 

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