संजीवनी टुडे

आजादी के आंदोलन में इटावा स्थित चंबल के डाकुओं ने भी दिखाया देशप्रेम

इनपुट- यूनीवार्ता

संजीवनी टुडे 14-08-2019 12:58:57

उत्तर प्रदेश में इटावा स्थित चंबल घाटी के डाकुओं के आंतक ने भले ही देश की कई सरकारों को हिलाया हो लेकिन यह बहुत ही कम लोग जानते है कि यहां के डाकुओं ने अग्रेंजी हुकूमत के दौरान आजादी के दीवानों की तरह अपनी देशप्रेमी छवि से देशवासियो के दिलों में ऐसी जगह बनाई कि हम उन्हें स्वतंत्रता दिवस के दिन याद किये बिना रह नही पाते है।


लखनऊ। शौर्य, पराक्रम और स्वाभिमान की प्रतीक उत्तर प्रदेश में इटावा स्थित चंबल घाटी के डाकुओं के आंतक ने भले ही देश की कई सरकारों को हिलाया हो लेकिन यह बहुत ही कम लोग जानते है कि यहां के डाकुओं ने अग्रेंजी हुकूमत के दौरान आजादी के दीवानों की तरह अपनी देशप्रेमी छवि से देशवासियो के दिलों में ऐसी जगह बनाई कि हम उन्हें स्वतंत्रता दिवस के दिन याद किये बिना रह नही पाते है।

चंबल फाउंडेशन के संस्थापक शाहआलम का कहना है कि आज़ादी पूर्व चंबल में बसने वाले डाकूओं को पिंडारी कहा जाता था। डाकुओं ने देश के क्रांतिकारियों को न केवल असलहा व गोला बारूद मुहैया कराया बल्कि उनको छिपने का स्थान भी दिया। चंबल के बीहड़ों में आजादी की जंग 1909 से शुरू हुई थी। चंबल में रहने वालों ने क्रांतिकारियों का भरपूर साथ दिया। बीहड़ क्रांतिकारियों के छिपने का सुरक्षित ठिकाना हुआ करता था। चंबल के डकैतों को बागी कहलाना ही पसंद है। आजादी के बाद बीहड़ में जुर्म होने लगे, जो उनकी मजबूरी थी। बीहड में बसे डकैतों के पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर क्रान्तिकारियों का साथ दिया लेकिन आजादी के बाद उन्हें कुछ नहीं मिला।      

राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में चंबल के किनारे 450 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में बागी आजादी से पहले रहा करते थे। उन्हें पिंडारी कहा जाता था। पिंडारी मुगलकालीन जमींदारों के पाले हुए वफादार सिपाही हुआ करते थे, जिनका इस्तेमाल जमींदार विवाद को निबटाने के लिए किया करते थे। मुगलकाल की समाप्ति के बाद अंग्रेजी शासन में चंबल के किनारे रहने वाले इन्हीं पिंडारियों ने जीवन यापन के वहीं डकैती डालना शुर कर दिया और बचने के लिए अपनाया चंबल की वादियों का रास्ता ।

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अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आन्दोलन में चंबल के किनारे बसी हथकान रियासत के हथकान थाने में साल 1909 में चर्चित डकैत पंचम सिंह, पामर और मुस्कुंड के सहयोग से क्रान्तिकारी पडिण्त गेंदालाल दीक्षित ने थाने पर हमला कर 21 पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतार दिया और थाना लूट लिया। इन्हीं डकैतों ने क्रान्तिकारियों गेंदालाल दीक्षित, अशफाक उल्ला खान के नेतृत्व में सन 1909 में ही पिन्हार तहसील का खजाना लूटा और उन्हीं हथियारों से नौ अगस्त 1915 को हरदोई से लखनऊ जा रही ट्रेन को काकोरी रेलवे स्टेशन पर रोककर सरकारी खजाना लूटा ।

इटावा के के.के.पीजी कालेज के इतिहास विभाग के प्रमुख डा.शैलेंद्र शर्मा डाकुओ की देशप्रेमी छवि का जिक्र करते हुये बताया कि देश के स्वतंत्रता आदोंलन के दौरान चंबल के खूंखार बागी ब्रह्मचारी ने अपने सैकडों सर्मथक बागियो के साथ हिस्सेदारी की। अग्रेजी फौज से मुकाबला करते हुये ब्रह्मचारी उनके करीब 35 साथी देश की आजादी की लडाई लडते हुये अपना बलिदान दिया।

चंबल के डाकुओं में भी आजादी हासिल करने का जुनुन पैदा हो गया था इसी परिपेक्ष्य मे ब्रह्मचारी नामक डकैत ने अपने साथियो के साथ आजादी की लडाई लड़ी। चंबल के महत्व की चर्चा करते हुये वे बताते है कि जंगे आजादी में चंबल घाटी का खासा योगदान माना जा सकता है क्यों कि आजादी की लडाई के दौरान कई ऐसे गांव रहे है जिनको या तो अंग्रेज अफसर खोज नही पाये या फिर उन गांव मे घुस नही पाये।

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अग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिये देश के हर वासिंदे ने अपने अपने तरीके से अपनी सामर्थ्य के अनुसार लडाई लडी है । हर किसी के जुनून ने देश को आजादी दिलाई है। ऐसे में यदि कोई अपराधी देश की आजादी के लिये लडाई लडे तो वाकई हैरत की बात ही मानी जायेगी वैसे तो चंबल के डाकुओ की छवि काफी खूखांर अपराधी के तौर पर हर किसी को पता है लेकिन यह बात बहुत कम ही लोग जानते है कि चंबल के डाकुओ ने कभी आजादी की लडाई मे भी खासी हिस्सेदारी करके अपना बलिदान दिया है।

स्वतंत्रता आदोलंन के दौरान साल 1914-15 मे क्रान्तिकारी गेंदालाल दीक्षित ने चंबल घाटी मे क्रान्तिकारियो के एक संगठन मातृवेदी का गठन किया। इस संगठन में हर उस आदमी की हिस्सेदारी का आहृवान किया गया जो देश हित में काम करने का इच्छुक हो इसी दरम्यान सहयोगियो के तौर चंबल के कई बागियो ने अपनी इच्छा आजादी की लडाई मे सहयोग करने के लिये जताई।

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ब्रह्मचारी नामक चंबल के खूखांर डाकू के मन में देश को आजाद कराने का जज्बा पैदा हो गया और उसने अपने एक सैकड़ा से अधिक साथियों के साथ मातृवेदी संगठन का सहयोग करना शुरू कर दिया। ब्रह्मचारी डकैत के क्रान्तिकारी आंदोलन से जुडने के बाद चंबल के क्रान्तिकारी आंदोलन की शक्ति काफी बढ गई तथा ब्रिटिश शासन के दमन चक्र के विरूद्व प्रतिशोध लेने की मनोवृत्ति तेज हो चली। ब्रहमचारी अपने बागी साथियो के साथ चंबल के ग्वालियर मे डाका डालता था और चंबल यमुना मे बीहडो मे शरण लिया करता था। ब्रहमचारी ने लूटे गये धन से मातृवेदी संगठन के लिये खासी तादात मे हथियार खरीदे।

इसी दौरान चंबल संभाग के ग्वालियर मे एक किले को लूटने की योजना ब्रहमचारी और उसके साथियो ने बनाई लेकिन योजना को अमली जामा पहनाये जाने से पहले ही अग्रेंजो को इस योजना का पता चल गया ऐसे मे अग्रेजो ने ब्रहमचारी के खेमे मे अपना एक मुखबिर घुसेड दिया और पडाव मे खाना बनाने के दौरान ही इस मुखबिर ने पूरे खाने मे जहरीला पदार्थ डाल दिया। इस मुखबिर की करतूत का ब्रहमचारी ने पता लगा कर मुखबिर को मारा डाला लेकिन तब तक अग्रेजो ने ब्रहमचारी के पडाव पर हमला कर दिया जिसमे दोनो ओर से काफी गोलियो का इस्तेमाल हुआ। ब्रहमचारी समेत उनके दल के करीब 35 बागी शहीद हो गये।

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कालेश्वर महापंचायत के अध्यक्ष बापू सहेल सिंह परिहार का कहना है कि चंबल घाटी का आजादी की लडाई में खासा योगदान रहा है। आजादी के दौरान कई ऐसे गांव रहे है जिन गांव मे अग्रेंज प्रवेश करने को तरसते रहे है और ऐसे भी कई गांव रहे है जहां पर अंग्रेज अफसरो को मौत के घाट तक उतार दिया है। चंबल इलाके का कांयछी एक ऐसा गांव माना गया है जॅहा पर अग्रेंज अफसरो आजादी के दीवानो को खोजने के लिये गांव को ही नही खोज पाये। इस घाटी के बंसरी गांव के तो दर्जनो शहीद हुये है। आज भले ही चंबल घाटी को कुख्यात डाकुओ की शरणस्थली के रूप मे जाना जा रहा है लेकिन देश की आजादी के बाद चंबल मे पनपे बहुतेरे डकैतो ने चंबल के बागियो की देशप्रेमी छवि को पूरी तरह से मिटा करके रखा दिया है।

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