संजीवनी टुडे

प्रयोगों के दौर से गुजरती सपा भी बसपा की तरह ही अविश्वसनीय

संजीवनी टुडे 06-06-2019 12:35:42

योगों के दौर से गुजर रहे समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के अब तक सभी प्रयोग असफल रहे हैं, फिर भी उनका मानना है कि जरूरी नहीं कि हर प्रयोग सफल हों।


लखनऊ। प्रयोगों के दौर से गुजर रहे समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के अब तक सभी प्रयोग असफल रहे हैं, फिर भी उनका मानना है कि जरूरी नहीं कि हर प्रयोग सफल हों। 

जानकारों की मानें तो नासमझी में इन प्रयोगों के कारण कहीं पार्टी का अस्तित्व ही न खत्म हो जाय। ऐसे में उनको सबसे पहले तो अपने पुराने लोगों को जोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए, जिससे अस्तित्व बचा रहे। यदि अखिलेश के बयान और उस पर अमल को देखें तो वह उस पर खरे नहीं उतरते। इतना जरूर है कि बसपा प्रमुख ने हर कदम पर अपना फायदा सोचकर दूसरों से नाता तोड़ा और जोड़ा है लेकिन प्रयोगों के शुरुआती दौर में ही अखिलेश यादव ने दो समझौते किये और दोनों में ही इनको ही नुकसान उठाना पड़ा।

2017 के विधानसभा में चुनाव में कांग्रेस के साथ सपा ने समझौता किया तो पार्टी की 177 सीटें कम हो गयी। उस समय भी अखिलेश कांग्रेस के साथ स्थायी समझौते की बात कर रहे थे। उनका यह बयान मायावती के समझाैता होने तक चलता रहा लेकिन चुनाव के समय कांग्रेस के खिलाफ भी जमकर आवाज उठाने लगे। 

मायावती से जब समझौता हुआ तो भाजपा नेताओं द्वारा बार-बार जल्द ही गठबंधन टूट जाने की घोषणा पर दोनों ने कहा कि यह स्थायी गठबंधन है लेकिन 144 दिन में ही टूट गया। इस बार के चुनाव में पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव की अपेक्षा सपा का वोट बैंक चार प्रतिशत कम हो गया। लोकसभा सीटों की संख्या भी गठबंधन के बावजूद 2014 के बराबर ही रह गयी। इसके बाद भी सपा ने कुछ नहीं बोला, जबकि 0 से 10 सीट पर पहुंची मायावती ने उन्हें झटका दे दिया। अब सपा समर्थकों का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में एक-एक सीट के लिए पार्टी तरस जाएगी। यहां उसकी वही स्थित हो सकती है, जो कांग्रेस की है।

समर्थकों में मायूसी, खिसक सकते हैं सपा से 
इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार सुनील शर्मा का कहना है कि अब सपा समर्थक भी आने वाले चुनाव में पार्टी से दूर हो सकता है। इसका कारण है कि अब तक पूरे यूपी में सपा और बसपा समर्थकों में ही ज्यादा विवाद देखने को मिलता था लेकिन इस चुनाव में अखिलेश यादव ने सब कुछ दरकिनार कर बसपा से समझौता कर लिया। उस समय तक दोनों पार्टियों के समर्थक यही मानते थे कि भाजपा काे हराने के लिए यह मजबूरी है। 

हमें भी एकजुटता दिखानी चाहिए लेकिन चुनाव में कुछ कर नहीं पाये। बसपा ने तो अपने सांसदों की संख्या शून्य से 10 पर पहुंचा भी दिया लेकिन सपा का तो चार प्रतिशत से ज्यादा वोट बैंक भी कम हो गया। इस स्थिति में भी मायावती ने ही पूरी पार्टी को नसीहत देते हुए झटका दिया। अब सपा समर्थकों में काफी मायूसी है, जिससे उबार पाना सपा प्रमुख के लिए कठिन चुनौती है।

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इस झटके से उबर पाना मुश्किल 
वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिंह राणा का कहना है कि यूपी में यादव समाज छह प्रतिशत के लगभग है। मुलायम सिंह यादव की बातों का उनके समर्थक विश्वास करते थे। मुलायम सिंह यादव भी अपने समर्थकों के लिए हर वक्त दरवाजा खोले रहते थे लेकिन अखिलेश यादव जमीनी नेता नहीं है। उनको सिर्फ गद्दी चाहिए। अपने लोगों के लिए आज तक अखिलेश का कोई संघर्ष भी देखने को नहीं मिला। इस कारण उनके समर्थकों में मायूसी देखने को मिल रही है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में तो सपा की वही हालत होगी, जो वर्तमान में यूपी में कांग्रेस की है। आगे के चुनाव में तो सपा का इससे उबर पाना मुश्किल है।

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