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दिग्गी राजा के चक्रव्यूह को नहीं भेद पा रहे सिंधिया महाराज

संजीवनी टुडे 21-04-2019 15:32:22


भोपाल। प्रदेश की राजनीति में अस्तित्व को लेकर कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं में सियासी जंग जारी है। वे शतरंज के खेल की तरह एक-दूसरे को मात देने में चूकते नहीं हैं। यहां राजा और महाराजा के बीच अस्तित्व की सियासी जंग छिड़ी हुई है। यह स्थिति लोकतंत्र की ही नहीं, बल्कि राजतंत्र के जमाने से है। वैसे तो रियासत के जमाने से सिंधिया घराना ग्वालियर से सटे इलाके को अपनी जागीर मानता आ रहा है, लेकिन तब भी उनकी हुकूमत को अधीनस्थ राजाओं ने पूरी तरह दिल से नहीं स्वीकारा और आज लोकतंत्र में भी उनको मात देने में पीछे नहीं है।

प्रभावी नेताओं के नाम से विभाजित हैं राज्य के इलाके 
इन दिनों लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व कहे जाने वाले लोकसभा का चुनाव चल रहा है और मध्यप्रदेश में 29 अप्रैल से 19 मई तक चार चरणों में मतदान होना है। प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस नेताओं की भूमिका क्या होगी, यह फैसला 23 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी के चुने गए सांसद करेंगे। मप्र को राजनीति के ठेकेदारों ने प्रभावी नेताओं के इलाके के नाम से विभाजित कर रखा है, जिसमें ग्वालियर-चंबल को सिंधिया का प्रभावी क्षेत्र कहा जाता है, जबकि राघौगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह देशभर की राजनीति को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं।

ग्वालियर-चम्बल के स्थानीय कांग्रेस नेताओं को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए महाराज के महल में ढोक लगाना जरूरी समझा जाता है। यह अलग बात है कि ढोक लगाने वाले कम ही नेताओं को सफलता हासिल हुई है। ग्वालियर-चंबल की चार लोकसभा सीट भिंड-दतिया, मुरैना-श्योपुर, ग्वालियर व शिवपुरी-गुना संसदीय क्षेत्र के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार सिंधिया की मंशानुसार तय होने चाहिए, ऐसा राजनीति के गणितज्ञ मानते हैं।

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राजा के चक्रव्यूह को नहीं तोड़ पाए महाराज
ग्वालियर-चंबल की चारों लोकसभा सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की घोषणा काफी विलंब से होने का कारण राजा और महाराजा के बीच रस्साकस्सी ही रही। राजनीति के सियासी खेल में राजा द्वारा बनाए गए चक्रव्यूह को महाराज तोड़ नहीं पाए। या यूं कहें कि लोकसभा चुनाव के पहले पायदान के टिकट वितरण में ही राजा ने महाराजा को बुरी तरह मात देने में सफलता हासिल की है। 

यह राजनीति के विशेषज्ञ ही नहीं बल्कि आम व्यक्ति भी मान रहा है। सबसे पहले भिंड-दतिया की बात करें तो यह टिकट भी दिग्गी राजा ने बड़ी चतुराई से महाराज से छीन ली। कहने को देवाशीष जरारिया कांग्रेस आलाकमान राहुल गांधी की पसंद हैं, लेकिन हकीकत में वह दिग्गी समर्थक हैं। ठीक इसी तरह सिंधिया की रियासत कहे जाने वाले ग्वालियर में भी दिग्गी राजा अपने चहेते अशोक सिंह को टिकट दिलाने में कामयाब रहे हैं। इस तरह उन्होंने सिंधिया को घर में घुसकर मात दी है।

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रहा सवाल मुरैना का तो यहां से सिंधिया समर्थक का टिकट जरूर हुआ है, लेकिन सफलता की आस बहुत दूर नजर आ रही है। सिंधिया को उनकी लोकसभा सीट गुना-शिवपुरी तक सिमटाने में दिग्गी राजा सफल रहे हैं। कुल मिलाकर, टिकट वितरण के मामले में राजा साहब का चक्रव्यूह भेदने में महाराज सफल नहीं हो पाए। इससे चुनाव बाद कांग्रेस के पक्ष में परिणाम आने के बाद दोनों के बीच चल रही जंग में नये तरह की गर्मी देखने को मिल सकती है। 

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