संजीवनी टुडे

क्रांतिकारी परमानंद, स्वाधीनता आन्दोलन के थे महानायक

संजीवनी टुडे 06-06-2020 20:58:05

-लाहौर षड़यंत्र केस में पंडित परमानंद 22 सालों तक सेलुलर जेल में रहे थे कैद


- 20वीं सदी के प्रथम दशक के परमानंद की जयंती पर उन्हें साहित्यकारों ने किया याद

-गृह क्षेत्र में भी पूर्व सांसद व स्थानीय लोगों ने परमानंद की प्रतिमा को किया नमन

हमीरपुर। बुन्देलखंड के स्वतंत्रता संग्राम के महा नायक क्रांतिकारी पंडित परमानंद महाराज की शनिवार को जयंती मनाते हुये साहित्यकारों ने सामाजिक दूरी का पालन करते हुये उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर याद किया। 

सुमेरपुर कस्बे में वर्णिता संस्था के तत्वाधान में आयोजित विमर्श विविधा के तहत जिनका देश ऋणी है कार्यक्रम में संस्था के अध्यक्ष एवं साहित्यकार डा.भवानीदीन प्रजापति ने कहा कि भारत की आजादी के लिये जब संघर्ष चल रहा था, तब बीसवीं सदी के प्रथम दशक में बुन्देलखंड में पंडित परमानंद ऐसे पहले क्रांतिकारी थे जो अपने आप में बेमिसाल थे। वर्ष 1914 तक पंडित जी अनेक देशों की यात्रा कर चुके थे। परमानंद का हमीरपुर जनपद के सरीला तहसील क्षेत्र के सिकरौंदा गांव में 6 जून 1892 को जन्म हुआ था। 

इनके पिता गया प्रसाद खरे व मां सगुना बाई थी। इनके दादा मनराखन देश प्रेमी थे। सत्तवनी समर में मनराखन का प्रभावी प्रतिभाग था। परमानंद अपने भाई बहनों में सबसे छोटे थे। इन्होंने इलाहाबाद में भाई के पास रहकर शिक्षा प्राप्त की थी। शिक्षा के  समय देश प्रेमियों से इनका सम्पर्क हुआ था। लाला लाजपत राय के इलाहाबाद के भाषण ने इन्हें राष्ट्र प्रेमी बना दिया था। यह आजीवन अविवाहित रहे। परमानंद गदर दल के संस्थापकों में से एक थे।

भारत की आजादी के लिये सिंगापुर में इनका विद्रोह का दिया गया भाषण उद्बोधनों में एक था। 21 फरवरी 1915 के सशस्त्र विद्रोह की कार्य योजना में परमानंद का प्रमुख हाथ था। देश द्रोहियों के कारण यह विद्रोह भले ही सफल ना हो पाया हो लेकिन उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। साहित्यकार ने बताया कि लाहौर षड़यंत्र केस के नाम से क्रांतिकारियों की धरपकड़ हुयी। 

13 सितम्बर 1915 को साथियों के साथ इन्हें फांसी की सजा दी गयी थी। जिसे बाद में काले पानी की सजा में बदल दिया गया था। यह सेलुलर जेल में 22 सालों तक कैद रहे। जनता ने परमानंद को पंडित जी की उपाधि से विभूषित किया था। इस कारण ये पंडित भी कहलाये। ये अगस्त 1937 को जेल से रिहा किये गये थे। इनका कालांतर में 13 अप्रैल 1982 को निधन हो गया था। कार्यक्रम में अवधेश कुमार गुप्ता एडवोकेट, राजकुमार सोनी, पिंकू सिंह, राधा रमण गुप्ता व अजय गुप्ता सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

जनपद के राठ कस्बे में भी भाजपा नेता एवं पूर्व सांसद राजनारायण बुधौलिया ने क्रांतिकारी परमानंद की 128वीं जयंती मनायी। कस्बे के पड़ाव स्थित उनकी प्रतिमा पर तमाम लोगों ने माल्यार्पण किया। व्यापार मंडल के जिलाध्यक्ष केजी अग्रवाल, सदानंद खरे, शिवम खरे, प्रदीप गुप्ता, सैयद शाहिद अली सहित तमाम लोगों ने परमानंद को याद करते हुये उनकी प्रतिमा को नमन किया। 

पंडित परमानंद की जयंती पर जेसीआई ने लोगों कोरोना वायरस से बचने के लिये लोगों को मास्क वितरित किये है। पूर्व सांसद राजनारायण बुधौलिया ने पंडित परमानंद के चित्र पर माल्यार्पण करते हुये क्रांतिकारी जीवन को याद किया। शिवम खरे, सदानंद खरे ने कहा कि 1857 के गदर में सक्रिय भाग लेने के कारण चरखारी रियासत को लूटने के अपराध में इनके दादा मनराखन खरे को 20 साल की सजा दी गयी थी। यहीं से परमानंद पर प्रभाव पड़ा और गदर पार्टी बनाकर भारत में एक साथ अंग्रेजी सरकार के खिलाफ इन्होंने विद्रोह की योजना बनाई थी लेकिन भितरघातियों के कारण योजना फेल हो गयी थी। 

हमीरपुर में भी राष्ट्रीय आंदोलनों को परमानंद ने दी थी गति
पंडित परमानंद ने यहां हमीरपुर में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों व नागरिकों के साथ मिलकर राष्ट्रीय आन्दोलन को गति दी थी। दीवान शत्रुघ्न सिंह, श्रीपत सहाय रावत, स्वामी ब्रम्हानंद, मन्नीलाल गुरुदेव सहित अन्य सेनानियों के साथ परमानंद सक्रिय रूप से जुड़े रहे। महात्मा गांधी के आवाहन पर भारत छोड़ों आन्दोलन में इन्होंने बिगुल फूंका था। जिसके कारण 19 अगस्त 1942 को दोबारा ये गिरफ्तार किये गये थे। 

इन्होंने सुल्तानपुर जेल में रखा  गया था। कांग्रेस मंत्रिमंडल के पुर्नगठन के बाद 10 मई 1946 को ये कारागार से रिहा हुये थे। 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के साथ ही सारे देश में सांप्रदायिकता की आग भड़क उठी थी। शरणार्थियों की मदद के लिये इन्होंने अविस्मरणीय कार्य भी किये। 

ओरछा, दतिया, सतना आदि में शरणार्थियों के शिविरों का संचालन भी परमानंद ने किया था। भारत सेवक समाज संस्था के ये अध्यक्ष भी रहे। साहित्यकारों ने बताया कि पंडित परमानंद महान देश भक्त और क्रांतिकारी थे। ये कर्मयोगी भी थे जिनके उच्च आदर्शों और उच्च कोटि के विचारों के कारण सारी दुनिया में इन्हें झांसी वाले पंडित जी के नाम से जाना जाता था।

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