संजीवनी टुडे

रायबरेली: कांग्रेस पर रिकार्ड बनाये रखने का दबाव, भाजपा नई रणनीति पर कर रही काम

संजीवनी टुडे 15-03-2019 17:13:42


रायबरेली। देश के पहले आम चुनाव से लेकर 2014 तक रायबरेली नेहरू गांधी परिवार के ही इर्द-गिर्द घूमती रही है। यहां का संसदीय प्रतिनिधित्व या तो नेहरू गांधी परिवार के लोगों ने किया या उनके बेहद करीबी लोगों ने। अब लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पर जहां अपना रिकार्ड बनाये रखने का दबाव है, वहीं भाजपा कांग्रेस के इस किले को भेदने की तैयारी में है। वह स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए रणनीति पर काम कर रही है।

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रायबरेली से केवल एक बार ही कांग्रेस के सांसद रहे जो कि स्थानीय थे। अन्यथा हमेशा यहां के लोगों ने गांधी नेहरू परिवार के लोगों पर ही भरोसा किया। हालांकि एक हकीकत ये भी है कि रायबरेली में इंदिरा गांधी को पराजय का सामना करना पड़ा। 

फिर भी ज्यादातर रायबरेली नेहरू और गांधी परिवार तक ही सिमटी रही। 1952 के आम चुनाव से अगर देखे तो पहली बार रायबरेली से इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी चुनाव जीते, जो कि 1962 तक यहां के सांसद रहे। 1967 में रायबरेली के ही रहने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री बैज नाथ कुरील मंत्री बने जो कि जवाहरलाल नेहरू के करीबी थे। 1967 में पहली बार इस सीट से इंदिरा गांधी चुनाव लड़ीं और जीत दर्ज की। 

1971 में वह दोबारा जीती लेकिन आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा और पहली बार इस सीट से कांग्रेस का आधिपत्य समाप्त हुआ। तब जनता पार्टी के राज नारायण इस सीट से विजयी हुए। 1980 में रायबरेली ने एक बार फिर करवट ली और इंदिरा गांधी को विजयी बनाया। लेकिन 1977 की पराजय से व्यथित इंदिरा ने इस सीट को छोड़ दिया और दूसरी जीती हुई दक्षिण भारत की मेदक की लोकसभा सीट को अपने पास रखा। 

बावजूद इसके रायबरेली से गांधी परिवार के लोगों ने अपना राजनीतिक संबंध बनाए रखा। 1981 में हुए उपचुनाव में इस परिवार के करीबी अरुण नेहरू ने जीत दर्ज की। 1984 में भी अरुण नेहरू सांसद बने। 1989 और 1991 में कांग्रेस से शीला कौल सांसद बनीं। 

इसके बाद 1996 और 1998 में भाजपा ने रायबरेली में अपना परचम फहराया और भाजपा के अशोक सिंह ने शीला कौल के पुत्र विक्रम कौल और पुत्री दीपा कौल को हराया। 1999 में कांग्रेस के सतीश शर्मा यहां से सांसद निर्वाचित हुए। तब सोनिया ने कर्नाटक की बेल्लारी और अपने पति राजीव गांधी के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा था और दोनों ही संसदीय सीटों पर जीत दर्ज की थी। 

इसके बाद 2004 में सोनिया गांधी ने अमेठी सीट बेटे राहुल गांधी के लिए छोड़ दी और स्वयं रायबरेली सीट पर जीत दर्ज कर सांसद बनीं। इसके बाद 2009 और 2014 में भी उन्होंने यहां से जीत दर्ज की। अब 2019 में फिर वह ​यहां से सियासी मैदान में हैं।

इस तरह रायबरेली सीट पर नेहरू गांधी परिवार का ही ज्यादा कब्जा रहा है। फिर भी क्षेत्र का जिस तेजी से विकास होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया। वहीं तीन बार यहां की जनता ने गांधी परिवार को निराश भी किया है। इस बार चुनाव में सोनिया के लिए रायबरेली के इसी समीकरण को समझने की चुनौती है। 

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वहीं भाजपा भी कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश में है। इसलिए इस बार स्थानीय नेता को उम्मीदवार बनाने की सियासी चर्चा जोरों पर है, जिससे रायबरेली की जनता अपना जुड़ाव महसूस कर सके। इसमें विधान परिषद सदस्य दिनेश प्रताप सिंह का नाम चर्चा में है।

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