संजीवनी टुडे

शिक्षा नीतियों पर चर्चा के साथ मनाया पी.यू.सी.एल. स्थापना दिवस

संजीवनी टुडे 26-06-2019 22:31:53

पीपुल यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) की अजमेर इकाई द्वारा 44वां स्थापना दिवस नई शिक्षा नीति पर विचार विमर्श के साथ मनाया गया। इस अवसर पर पीयूसीएल के पदाधिकारियों ने नई शिक्षा नीति के मसौदे को अच्छा बताया।


अजमेर। पीपुल यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) की अजमेर इकाई द्वारा 44वां स्थापना दिवस नई शिक्षा नीति पर विचार विमर्श के साथ मनाया गया। इस अवसर पर पीयूसीएल के पदाधिकारियों ने नई शिक्षा नीति के मसौदे को अच्छा बताया। राजकीय महाविद्यालय के प्रोफेसर डा. सुरेश अग्रवाल ने सभी सहभागी सदस्यों को पी.यू.सी.एल. स्थापना दिवस की बधाई दी एवं नई शिक्षा नीति पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय परम्परा को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2019 का प्रारूप तैयार किया गया है। जिसमें शिक्षा जगत के सर्वांगीण विकास की बात रखी गयी है।

 शिक्षा नीति के शोध में गुणवत्ता का पूर्ण रूपेण ध्यान रखा गया है। नई शिक्षा नीति का मसौदा अच्छा है परन्तु कार्यान्वयन भी उस तबके का होगा तभी यह शिक्षा नीति कारगर सिद्ध हो सकेगी। पी.यू.सी.एल. राज्य महासचिव डा. अनन्त भटनागर ने कहा कि आपात काल के दौरान पी.यू.सी.एल. की स्थापना हुई। वर्तमान माहौल में बिना आपातकाल की घोषणा के भी आपातकाल जैसी स्थिति मौजूद है तथा पी.यू.सी.एल. और पी.यू.सी.एल. जैसे अन्य जनसंगठनों के अस्तित्व की जरूरत और अधिक हो गयी है। डॉ भटनागर ने नई शिक्षा नीति में 6 से 14 वर्ष को बढ़ा कर 3 से 18 वर्ष तक के बच्चों को राइट टू एजुकेशन के तहत अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराये जाने के प्रावधान को प्रशंसनीय बताया। राज्य उपाध्यक्ष डी.एल. त्रिपाठी ने कहा कि नई शिक्षा नीति को जिन विषमताओं का पूरक बनाकर लागू किये जाने का विचार सरकार ने जनता के समक्ष रखा है यह बहुत ही अच्छा प्रयास है कि पुरानी एवं रूढ़ीवादी शिक्षा नीति में बदलाव कर शिक्षा को जीवन कौशल के साथ जोड़ा जाए तथा तकनीकी ज्ञान कौशल के विकास के भी विकल्पों को उपलब्ध कराकर इसे क्रियान्वित किया जाये। 

शिक्षा पाठ्यक्रम में मानवाधिकार शिक्षा को जोड़ा जाना वर्तमान समय की नितांत आवश्यकता है। जिसके माध्यम से बच्चों को प्रारम्भ से ही मानवीय मूल्यों की जानकारी प्रदान हो और वे समाज में इन मूल्यों को स्थापित कर सके। पूर्व जिला अध्यक्ष ओ.पी.रे ने धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि आज भी ग्रामीण परिवेश में रहने वाले मजदूर घरों के बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। उनको अनिवार्य शिक्षा नहीं दे पाने की विवश्ता सरकार तथा समाज की है तो कहीं उनकी आजीविका का लोभ भी अनिवार्य शिक्षा को उनसे दूर करता है। नई शिक्षा नीति में इसका समाधान निकाला जा सकता है। सर्वसहमति से आए कुछ सुझाव— विचार व्याख्या के दौरान कुछ सुझावों में सर्वसहमति दी गई कि शिक्षाविद को ही शिक्षा मंत्री का पद दिया जाए, एकरूपी शिक्षा हो, सरकार नियंत्रित शिक्षा व्यवस्था हो, सम्पूर्ण शिक्षा व्ययों को सरकार द्वारा वहन किया जाये, शिक्षा राजनीति एवं राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त हो, शिक्षकों के पदस्थापन की नीति पारदर्शी हो, निर्धारित एवं निश्चित मापदण्डों के आधार पर शिक्षकों की भर्ती की जाए, शिक्षकों के पद का मान रखते हुए उनसे अध्यापन कार्य के अलावा अन्य सहायक कार्य एवं अन्यत्र दूसरा कार्य न कराया जाए, नीति निर्माण, क्रियान्वयन, निगरानी अथवा देखरेख तथा गतिविधी (पीडीसीए) नियम का पालन किया जाना सफल शिक्षा का स्वरूप प्रदान करेगा। 

जिला अध्यक्ष केशव राम सिंघल ने बताया कि शि्क्षा का पाठ्यक्रम में प्रारम्भिक व अनिवार्य शिक्षा में आधारभूत शिक्षा का समावेश हो जो ज्ञानार्जन और अर्थअर्जन में सामन्जस्य स्थापित करने में सहायक हो। शिक्षा में सामाजिक सरोकारों को बाध्यता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। साथ ही शिक्षा स्तर के विकास के लिए समाज में भी चेतना एवं जागरूकता स्थापित होनी चाहिए। कार्यक्रम में सिस्टर केरोल गीता, सिस्टर अलवीना, राधावल्लभ शर्मा, श्याम शंकर सिन्हा, सुशील कुमार बैरवा, महावीर भाटी, मोहम्मद रामीज, डा. सुनीता तंवर, आशा वर्मा, रमेश बंसल, सुभाष चांदना, गोविन्द सिंह एवं अन्जू नयाल ने भी अपने विचार व्यक्त किए। 

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