संजीवनी टुडे

लक्खा नाग नथैया मेला की तैयारी पूरी, घाट पर होगा द्यापर युग का एहसास

संजीवनी टुडे 10-11-2018 17:23:36


वाराणसी। वाराणसी के चार प्रमुख लक्खा मेले में शुमार तुलसीघाट का विश्व प्रसिद्ध नाग-नथैया मेला 11 नवम्बर रविवार को है। मेला अपरान्ह तीन बजे से अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास और श्री संकटमोचन मंदिर के महन्त प्रो. विश्वम्भर नाथ मिश्र की देखरेख में सम्पन्न होगा। पूरे मेले के दौरान तुलसीघाट पर द्यापर युग का एहसास होगा। ‘सात वार, नौ त्यौहार’ के फक्कड़ी जीवन शैली को जीने वाली उत्सवधर्मी काशी भी मेले में सहभागिता के लिए तैयार हैं। शनिवार को मेले की तैयारियां पूरे दिन घाट पर चलती रही। घाट पर गंगा में आयी बाढ़ के कारण जमा मिट्टी और सिल्ट हटाने का काम युद्धस्तर पर चल रहा था। 

मेला आयोजन समिति से जुड़े गोपाल पाण्डेय ने बताया कि गंगा में जल प्रदूषण रोकने के लिए इस मेले का आयोजन किया जाता है। तुलसीघाट पर मेले की शुरूआत अपरान्ह तीन बजे होगी। भगवान श्रीकृष्ण और उनके बाल सखा गंगा नदी प्रतीक रूप से यमुना के किनारे कंचुक गेंद खेलते हैं। खेलते-खेलते गेंद यमुना में चली जाती है। यमुना में कालियानाग के रहने के कारण कोई नदी के किनारे भी नहीं जाना चाहता। बाल सखाओं के दबाव पर कान्हा शाम चार बजकर चालीस मिनट पर कदम्ब की डाल के उपर चढ़कर यमुना में कूद जाते हैं।

काफी देर तक कान्हा जब नदी से नहीं निकलते तो बाल सखा मायूस और अकुलाने लगते हैं। इसके कुछ समय बाद भगवान श्रीकृष्ण कालियानाग का मान मर्दन कर उसके फन पर नृत्य मुद्रा में वेणुवादन कर प्रकट होते हैं। पूरा गंगा तट और वहां उपस्थित लाखों श्रद्धालू देशी-विदेशी पर्यटक नटवर नागर भगवान श्रीकृष्ण की जय हर-हर महादेव के उद्घोष से गुंजायमान कर देते हैं। इसी दौरान नटवर नागर की महाआरती देख श्रद्धालू निहाल हो जाते हैं लीला का यही समापन होता है। 

क्यों जुटती हैं मेला देखने के लिए लाखों की भीड़
काशी के ऐतिहासिक व लक्खी मेले में शुमार तुलसीघाट के नागनथैया मेले की शुरूआत गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। गोस्वामी तुलसीदास ने भदैनी में लगभग 492 साल पहले कार्तिक माह में शुरू की गई इस 22 दिनों की लीला की परंपरा आज भी कायम है।

संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो विश्वंभरनाथ मिश्रा ने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास ने इस लीला में सभी धर्मों के भेदभाव को मिटा दिया है। मेले में सभी पात्र अस्सी भदैनी के ही हैं। उन्होंने बताया मेलें में परम्परानुसार काशी नरेश के उत्तराधिकारी महाराज कुवंर अनन्त नारायण सिंह अनके बेटे रामनगर दुर्ग से गंगा में बड़े स्टीमर के काफिले में तुलसीघाट पहुंचते हैं। पूर्व काशी नरेश स्टीमर में सवार होकर ही लीला की प्रदक्षिणा कर लीला देखते हैं। इसके तुरन्त बाद अस्थाई कदम्ब की डाल से भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप यमुना में कूदते हैं। पहले से ही प्रशिक्षित गोताखोर भगवान के स्वरूप को गोद में लेकर गंगा में बने कालियानाग के फन पर विराजमान कराते हैं। कालियानाग के फन पर वेणुवादन करते भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में स्वयं भगवान आ जाते हैं ऐसा जनमानस में विश्वास हैं। पूरी लीला के दौरान भगवान भोले की नगरी मानो गोकुल बन जाती है।

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काशी में मान्यता है कि स्वयं महादेव भी इस लीला में किसी न किसी रूप में मौजूद रहते हैं। उनकें प्रतिनिधी के तौर पर मेले में काशीराज परिवार स्वयं उपस्थित होता है। लीला के समापन के बाद महाराज लीला कमेटी के व्यवस्थापक को परम्परानुसार सोने की गिन्नी भी देते हैं। 

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