संजीवनी टुडे

साहित्यिक गतिविधियों के तहत जवाहर कला केन्द्र में ‘गांधी-नेहरू संवाद‘ का हुआ आयोजन

संजीवनी टुडे 09-08-2019 21:26:20

डॉ. पुरूषोत्तम अग्रवाल और डॉ. आलोक श्रीवास्तव ने रखे अपने विचार


जयपुर। साहित्यिक गतिविधियों के तहत जवाहर कला केन्द्र द्वारा आज रंगायन सभागार में ‘‘गांधी-नेहरू संवाद‘‘ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। हिंदी के जाने-माने लेखक एवं आलोचक, प्रोफेसर पुरूषोत्तम अग्रवाल और प्रसिद्ध लेखक एवं समाज विज्ञानी, डॉ. आलोक श्रीवास्तव इस संगोष्ठी के वक्ता थे। संगोष्ठी का संचालन राजस्थान के प्रसिद्ध हिन्दी लेखक, डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने किया। जवाहर कला केन्द्र के अतिरिक्त महानिदेशक, श्री फुरकान खान भी इस अवसर पर उपस्थित थे। 

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संगोष्ठी की शुरूआत में डॉ. आलोक श्रीवास्तव ने ‘महात्मा गांधी और उन पर असत्य के प्रयोग‘ विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि गांधी और भगतसिंह, सुभाष चन्द्र बोस एवं अम्बेडकर के मध्य मतभेदों को लेकर फैलाई जा रही अफवाहों में अर्धसत्य है। उन्होंने कहा कि इन सभी का भले ही एक दूसरे से वैचारिक असहमति हो लेकिन वे सदैव एक दूसरे का सम्मान करते थे। गांधीजी की अंहिसा की विचारधारा ने देश के आजादी के आंदोलन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी विचारधारा ने धर्म, भाषा, वर्गों, जातियों, आदि की विविधताओं से भरे देश भारत को एकसूत्र में बांधा और सभी में एकता कायम की। उन्होंने 20वीं सदी की शुरूआत में ब्रिटिश शासन को उचित ठहराने वाले मुहावरे “व्हाइट मैन्स बर्डन“ का उल्लेख करते हुए कहा कि अंहिसा इतनी शक्तिशाली विचारधारा थी कि इसने अंग्रेजों को भी सकते में डाल दिया था।

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उन्होंने कहा यह आरोप सत्य नहीं है कि गांधीजी ने भगतसिंह की फांसी रोकने के लिए अधूरे मन से प्रयास किए थे। उन्होेंने कहा कि हालांकि गांधीजी हिंसक आंदोलन में विश्वास नहीं करते थे, लेकिन उन्होंने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी रूकवाने के पूरे प्रयास किए। इसी तरह आजादी पाने के गांधी और सुभाष चन्द्र बोस के तरीके अलग-अलग थे, इसके बावजूद गांधी के मन में बोस के प्रति बहुत सम्मान था। महात्मा गांधी ने सुभाष चन्द्र बोस को देशभक्तों का पिं्रन्स कहा था और मानते थे कि उनकी जैसी देशभक्ति का कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि 1932 में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की सिफारिश पर बनाये गये दलितों का अलग निर्वाचक वर्ग बनाए जाने के विरोध में गांधीजी भूख हडताल पर चले गए थे। 24 सितम्बर 1932 में ‘पूना पैक्ट‘ के जरिए गांधी और नेहरू ने अलग निर्वाचक वर्ग की जगह प्रांतीय सभाओं में दलितों का आरक्षण सुनिश्चित किया। डॉ. श्रीवास्तव ने अंत में कहा कि हालांकि गांधी और उनके समकालीनों तथा देश के लोगों के विचारों में कुछ भिन्नता थी, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि गांधी सभी के लोकप्रिय नेता थे। 

संगोष्ठी के तहत आयोजित दूसरे सत्र में प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ‘गांधी नेहरू संवाद‘ पर सम्बोधित किया। उन्होंने श्रोताओ को गांधीजी और नेहरूजी के विचारों की समानता और भिन्नता के बारे में बताया। भारत की स्वंतत्रता से दो वर्ष पूर्व गांधी और नेहरू के मध्य हुये पत्राचार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अपने पत्रों में गांधी और नेहरू दोनों ही  ने आजाद भारत के विकास के बारे में अपने और नेहरू के विचारों में भिन्नता पर विस्तृत चर्चा की थी, लेकिन ये निश्चित था कि दोनों ही इस देश की उन्नति में सभी को सम्मिलित करना चाहते थे वो भी प्रजातांत्रिक ढंग से । अग्रवाल ने कहा कि नेहरू मानते थे कि गांधी का सबसे बड़ा योगदान यह नहीं था कि उन्होंने आजादी के आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया, बल्कि यह था कि  राजनीति का आधार " नैतिक मूल्य " होना चाहिए। 

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डॉ. अग्रवाल ने अपनी नई किताब “हू इज भारत माता“ का उल्लेख भी किया, जिसमें उन्होंने नेहरू की क्लासिक पुस्तकों - एन ऑटोबायोग्राफी, ग्लिमसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री और द डिस्कवरी ऑफ इंडिया के अंश तथा आजादी से पहले और बाद के उनके भाषणों, निबंध, पत्रों और कुछ इंटरव्यू को शामिल किया है। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि नेहरू सिर्फ अच्छे राजनेता ही नहीं बल्कि बड़े विचारों से युक्त और उन्हें कार्यरूप में बदलने की क्षमता रखने वाले व्यक्ति भी थे। उन्हें भारतीय सभ्यता की बहुत अच्छी समझ थी। अग्रवाल ने कहा कि कई मामलों पर गांधी और नेहरू के बीच मत भिन्नता थी परंतु दोनों एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे  और मत भिन्नताओं पर खुल कर अपने पत्रों में चर्चा भी करते थे ।नेहरू गांधी को प्रकाश कहते थे और गांधी जी ने बहुत स्पष्ट शब्दों में नेहरू को अपना उत्तराधिकारी माना था ।

अग्रवाल ने कहा कि नेहरू और गांधी दोनों की  समझ की आज बेहद आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि   व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी से  फारवर्ड किए जाने वाले मैसेज के जरिए ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता इसलिए हमें विशेषकर युवाओं को अध्ययन की आदत डालनी चाहिए । डॉ. अग्रवाल ने कहा कि नेहरू के अनुसार भारत माता - भारत में रहने वाले लोगों से बनी है जो इस पूरे देश में रहते हैं। दोनांे ही सत्रों के अंत में वक्ताओं द्वारा श्रोताओं के सवालों के जवाब भी दिये गये।

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