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कजली तीज पर सुहागिनों ने मास्क लगाकर की पीपल डाली की पूजा

संजीवनी टुडे 06-08-2020 22:25:26

भाद्रपद कृष्णा तृतीया गुरुवार को कजली तीज के रूप में मनाई गई। सुहागिनों ने व्रत रखा और शाम को पूजा की।


उदयपुर। भाद्रपद कृष्णा तृतीया गुरुवार को कजली तीज के रूप में मनाई गई। सुहागिनों ने व्रत रखा और शाम को पूजा की। चंद्र दर्शन के बाद सत्तू, कच्चे दूध, नींबू आदि पारम्परिक निर्धारित सामग्री से व्रत खोला गया। महिलाएं पूजा करने मास्क लगाकर पहुंचीं। खास बात यह रही कि परिधानों के अनुसार मास्क भी डिजाइनर थे। 

भाद्रपद कृष्णा तृतीया वैष्णव सम्प्रदाय में सातुड़ी तीज के नाम से मनाई जाती है। इस त्यौहार को काजलिया तीज के नाम से भी जाना जाता है। कई मंदिरों में इस अवसर पर प्रभु को श्याम चुनरी का शृंगार धराया जाता है। इस त्यौहार में महिलाएं खड़े नीम की पूजा नहीं कर नीम की डाली को दीवार के सहारे खड़ा करके उसकी पूजा करती हैं। 

महिलाओं ने एक-दूसरे को परम्परागत कथा सुनाई। कथा के अनुसार एक अमीर व्यक्ति के 7 लडक़े थे, 6 का विवाह अच्छे परिवारों में हुआ, किंतु एक का गरीब परिवार में हुआ। जब रूढ़ीवादी परंपराओं में सत्तू पीहर से आने की परंपरा थी एवं आज भी है तो उस गरीब लडक़ी के पीहर वालों की हैसियत नहीं थी तो उसने अपने पति से कहा के मुझे सत्तू चाहिए। पति अपनी पत्नी से प्रेम की खातिर एक सेठ के यहां गया और चोरी चुपके वहां रसोई में सत्तू बनाने लगा। खटपट की आवाज आने से लोग जग गए और उसे पूछा तो उसने पूरा प्रसंग बता दिया। तब उस सेठ ने प्रसन्न होकर न केवल सत्तू बनवाया बल्कि साथ में कपड़े वगैरह भी लेकर गया। यह देख कर लडक़ी ने सेठ को अपना धर्म भाई बना लिया। कहानी का संदेश है कि जीवन में यदि प्रेम बढ़ाना है तो पत्नी को भी प्रसन्न रखने के विचार से जहां तक बन सके उसकी बात मानने का प्रयास करना चाहिए।

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