संजीवनी टुडे

राष्ट्रीय रामायण मेला : परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई

संजीवनी टुडे 23-02-2020 20:47:26

भगवान राम और ऋषियों, मुनियों की सत्संग स्थली चित्रकूट के राष्ट्रीय रामायण मेले में अलौलिक दृश्य रविवार को देखने को मिला।


चित्रकूट। भगवान राम और ऋषियों, मुनियों की सत्संग स्थली चित्रकूट के राष्ट्रीय रामायण मेले में अलौलिक दृश्य रविवार को देखने को मिला। यहां रामचरितमानस व विभिन्न रामायणों के शोधपरक विभिन्न भाषा—भाषी विद्वानों के बौद्धिक व्याख्यानों, ख्यातिलब्ध कथावाचकों के पारंपरिक प्रवचन, रामलीला, रासलीला तथा भगवान श्रीराम एवं कृष्ण काव्यों के आधार पर जैसे शास्त्रीय नृत्यों, रामकथा प्रदर्शनी आदि विविध रसोत्पादक एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रम हो रहे हैं। 

राष्ट्रीय रामायण मेले के तीसरे दिन आज रामायण के विभिन्न प्रख्यात विद्वानों में छिंदवाडा मप्र के सीताराम शरण रामायणी ने श्रीराम और रामायण के बारे में कहा कि मानस की चैपाईयां मंत्र हैं। श्रीरामचरितमानस आदर्श जीवन के लिये आचार संहिता के समान है। मनुष्य यदि मानस की एक चैपाई को भी जीवन में उतार ले तो उसका जीवन भवसागर पार हो जायेगा। उन्होंने कहा कि ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई’ अर्थात दूसरों की भलाई के समान कोई दूसरा धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाने के समान कोई अधर्म नहीं है। 

छिंदवाड़ा से पधारीं सुश्री वसुंधरा रामायणी ने कहा कि जीवन में और समाज की प्रगति में नारी की विशेष भूमिका है। वनवास प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि वनवास तो रामजी का हुआ था परंतु अपने पति के सुख दुख में साथ रहने वाली माता जानकी ने भी पति के साथ अपने महलों का सुख त्याग करके वन जाना स्वीकार किया और वन के अनेक कष्टों को प्रसन्नतापूर्वक सहन किया। 

झांसी की मानस मंदाकिनी ने कहा कि प्रभु श्रीराम से लगन लग जाने पर मानो जीवन का सुधार हो जाता है तो श्रीराम के प्रति समर्पित होकर जीवन जीने की आवश्यकता है। सभा का संचालन करते हुए प्रयागराज से पधारे डा सीताराम सिंह ‘विश्वबंधु’ ने रामचरितमानस से शिक्षा ग्रहण कर मर्यादा पूर्ण जीवन जीना चाहिये। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम है और वर्तमान समय मर्यादा का हनन हो रहा है। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा दिये जाने की नितांत आवश्यकता है। महोबा के व्यास जगजीवन प्रसाद तिवारी ने ‘बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।’ चैपाई के माध्यम से सत्संग की महिमा का वर्णन किया। 

रामकथा व्यास मानस किंकर सनत कुमार मिश्र ने हनुमान जी की पूंछ को प्रतिष्ठा वाली बताते हुए हनुमान को विद्या, बल और करुणा का सागर बताया। मानस मर्मज्ञ चित्रकूट के बरद्वारा के माताबदल यादव ने हनुमान जी की पूंछ के बारे में बताया कि जब भगवान शंकर अपना रुप बदलकर हनुमान जी के रुप में आये तो उस समय माता पार्वती शंकर जी के साथ में आने के लिए तैयार हुईं। 

शंकर जी ने पूछा कि तुम किस रुप में और क्यों चलोगी तो प्रतिउत्तर में मां पार्वती ने कहा कि तुम्हारी पूंछ मेरे चलने पर ही संभव है क्योंकि बिना शक्ति के किसी की पूछ नहीं होती। उस समय भगवान शंकर हनुमान जी का रुप धारण कर पूंछ के रुप में माता पार्वती को संहारकारिणी शक्ति के नाम पर धारण कर पृथ्वी में आये और जब लंका में रावण ने कहा कि इस बंदर की पूंछ को जला दो क्योंकि जब वानर पूंछहीन हो जायेगा तो यह शक्तिहीन हो जायेगा।

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