संजीवनी टुडे

नाबालिग को आपराधिक केस में मिली सजा भविष्य के लिए रोड़ा नहीं : हाईकोर्ट

संजीवनी टुडे 10-04-2020 17:57:20

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि नाबालिग को आपराधिक मामले में मिली सजा उसके भविष्य की राह में रोड़ा नहीं बन सकती है। नाबालिग को मिली सजा के आधार पर उसको सरकारी सेवा में नियुक्ति के अयोग्य ठहराना अनुचित है।


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि नाबालिग को आपराधिक मामले में मिली सजा उसके भविष्य की राह में रोड़ा नहीं बन सकती है। नाबालिग को मिली सजा के आधार पर उसको सरकारी सेवा में नियुक्ति के अयोग्य ठहराना अनुचित है। कोर्ट ने कहा कि नाबालिगों के मामले में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की मंशा एकदम साफ है कि नाबालिग को मिली सजा उसकी अयोग्यता नहीं मानी जाएगी। मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति समित गोपाल की पीठ ने कांस्टेबल भर्ती 2015 के अभ्यर्थी शिवम मौर्य की नियुक्ति इस आधार पर निरस्त  करने के आदेश को रद्द कर दिया है। तथा उसे 30 दिन के भीतर सेवा में वापस लेने का आदेश दिया है। कोर्ट ने एकलपीठ के याचिका खारिज करने के आदेश के खिलाफ विशेष अपील पर अपना निर्णय 24 फरवरी को सुरक्षित कर लिया था, जिसे 10 अप्रैल को सुनाया गया। खंडपीठ ने इस मामले में एकल न्याय पीठ के 5 मार्च 2018 के आदेश को रद्द  कर दिया है। 

मामले के अनुसार अभ्यर्थी शिवम मौर्य ने सिपाही भर्ती 2015 के लिए आवेदन किया था। लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षा और मेडिकल परीक्षण में सफल रहा। प्रशिक्षण के लिए देवरिया भेज दिया गया। दस्तावेजों के सत्यापन के साथ दाखिल हलफनामे में कहा कि वह किसी आपराधिक मामले में लिप्त नहीं रहा है। न ही उस पर कोई मुकदमा दर्ज है। उसकी जांच कराई गई तो पता चला कि मारपीट, गंभीर चोट पहुंचाने के आरोप में उसके खिलाफ 28 जून 2013 को प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। जिसमें उसे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने एक साल की सजा और 35 हजार का जुर्माना लगाया था। हलफनामे में गलत जानकारी दिए जाने के आधार पर उसकी नियुक्ति निरस्त कर उसे सेवा से बाहर कर दिया था। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। 

एकल न्याय पीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी याची ने मुकदमा दर्ज होने की जानकारी छिपाई है, इसलिए उसे राहत नहीं दी जा सकती है। एकल पीठ के फैसले को अपील में चुनौती दी गई। अपील पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने कहा कि घटना के समय याची मात्र 16 साल का था। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है कि नाबालिग को दी गई सजा की वजह से उसके जीवन में दुष्परिणाम भुगतना नहीं पड़ेगा। इसलिए सजा सम्बंधी दस्तावेज एक निश्चित समय पर समाप्त कर दिए जाते हैं। इस संबंध में कानून की मंशा साफ है कि नाबालिग को मिली सजा उसके जीवन निर्वाह में कभी आड़े न आए। उसे मिली सजा उसकी अयोग्यता नहीं मानी जाएगी। इसलिए सजा मिलने का तथ्य छुपाए जाने का कोई अर्थ नहीं है। सम्बंधित अधिकारी यह समझने में नाकाम रहे कि याची जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के प्रावधानों का लाभ पाने का अधिकारी है।

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