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प्रवासियों का दर्द : अधूरी रह गई दिल्ली में मजदूरी कर बंधक पड़ा खेत छुड़वाने की मंशा

संजीवनी टुडे 04-06-2020 12:00:16

बेगूसराय के सुदूरवर्ती गांव वाजितपुर के भोला और संजीत की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय थी। पिता की बीमारी में तीन कट्ठा खेत 40 हजार में बंधक रह गया लेकिन पिता नहीं बच सके।


बेगूसराय। बेगूसराय के सुदूरवर्ती गांव वाजितपुर के भोला और संजीत की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय थी। पिता की बीमारी में तीन कट्ठा खेत 40 हजार में बंधक रह गया लेकिन पिता नहीं बच सके। इसके बाद उसके परिवार की हालत काफी दयनीय हो गई। स्थानीय स्तर पर सही तरीके से काम-धंधा नहीं मिलने के बाद जनवरी में दोनों भाई दिल्ली चले गए थे। उनके गांव के बहुत सारे लोग दिल्ली में रहते थे, जिनकी मदद से दोनों ने गांधीनगर के कपड़ा फैक्ट्री में काम शुरू कर दिया। दोनों को आठ-आठ हजार रुपया महीना मजदूरी मिलने लगा। 

फरवरी में जब पहली बार मजदूरी मिली तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन दोनों भाइयों ने मिलकर छह हजार रुपया अपनी मां को भिजवा दिया ताकि गांव में उनके परिवार का सुरक्षित तरीके से भरण-पोषण हो सके। मार्च में भी दोनों भाई ने छह हजार घर भेज दिया उनकी सोच थी अगले महीना फिर मजदूरी मिलेगी तो घर भेजेंगे। लगातार पैसा भेजते रहेंगे तो बंधक लगा खेत छूट जाएगा लेकिन उनकी यह मंशा अधूरी रह गई। अब दोनों भाई घर आ चुके हैं और ना तो पल्ले रोजगार बचा है, ना ही पैसा। उन्हें ये नहीं समझ आ रहा कि वे अब यहां क्या करेंगे।

हालांकि दोनों भाइयों ने मनरेगा में काम के लिए आवेदन दिया, जॉब कार्ड अभी नहीं मिला है। लेकिन जॉब कार्ड मिल भी जाएगा तो काम नहीं मिलेगा क्योंकि उनके पंचायत में मनरेगा के अधिकतर काम जेसीबी और ट्रैक्टर से होता है। मार्च में जब लॉकडाउन हो गया तो दिल्ली में भी सभी काम-धंधे बंद हो गए, इन दोनों भाई के पास बचा कर रखे गए 2700 रुपये से किसी तरह भोजन चलने लगा। जो आटा 32 रुपये किलो बिकता था धंधेबाजों ने 60 रुपये किलो कर दिया। 

सरसों का तेल मिलने लगा दो सौ रुपये किलो। राशन लाने में भी काफी परेशानी थी, पुलिस से छुप-छुप कर जाना पड़ता था, पुलिस देख लेती थी तो खाना के बदले मिलता था डंडा। किसी तरह दिन गुजरते रहे, धीरे धीरे पास का पैसा खत्म हो गया तो परेशानी बढ़ गई। जिस मालिक के यहां काम करते थे उसके पास गुहार लगाई लेकिन उसने किसी तरह मदद करने से इनकार कर दिया। मकान मालिक ने भी कोई रियायत नहीं की। अब इन लोगों की आशा सरकार पर टिकी हुई थी, दिल्ली सरकार ने घोषणा की कि मजदूरों को पैसा और राशन मिलेगा। दोनों भाइयों को भी लगा कि अब कुछ जुगाड़ हो जाएगा लेकिन ना तो राहत मिली और ना ही राशन, तीन दिन भूखे रहना पड़ा। 

इसके बाद उन्होंने गांव के दूसरे शख्स से, जो शहर में ही रहता था और काम दिलाने में मदद की थी, दो बार एक-एक हजार कर्ज लिया और खाते रहे लेकिन मकान मालिक ने किराया देने का दबाव बना दिया। इसके बाद एक दुकानदार से हाथ-पैर जोड़कर दो किलो चुरा ले लिया और रात के अंधेरे में चल पड़े हजारों किलोमीटर दूर अपने गांव की अनंत यात्रा पर। बीच में जहां पुलिस मिलती थी, रोक दिया जाता था लेकिन फिर भी वह सब किसी तरह रास्ते में मिले साथियों के साथ आगे बढ़ते रहे। कहीं रेलवे लाइन तो कहीं सड़क के रास्ते 17 दिनों की दुखदाई यात्रा के बाद गांव पहुंचे। 

अपनी जांच कराई, जांच में किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं मिलने पर जब घर पहुंचे तो विधवा मां के आंसुओं ने दोनों भाई को भी रुला डाला। उनके आंसू एक तरफ सपनों के मर जाने के आंसू थे, तो दूसरी ओर कोरोना से सुरक्षित घर आ जाने की खुशी भी थी। अब दोनों भाई गांव में काम खोज रहे हैं, नहीं मिला तो कुदाल-खुरपी चलाकर किसी तरह गुजारा करेंगे। लेकिन इससे तो बंधक बना खेत नहीं छूटेगा। खेत छुड़ाने के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत होगी और उसके लिए कहीं ना कहीं बाहर जाकर ही काम करना पड़ेगा।

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