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प्रवासियों का दर्द : दुख भरे दिन आए तो सब ने हमें भुला दिया, ठुकरा दिया

संजीवनी टुडे 02-06-2020 11:12:13

देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में देशभर से प्रवासी कामगारों का जमावड़ा होता है। जिसमें सबसे अधिक संख्या बिहार के श्रमिकों की है।


बेगूसराय। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में देशभर से प्रवासी कामगारों का जमावड़ा होता है। जिसमें सबसे अधिक संख्या बिहार के श्रमिकों की है। बिहारियों ने दिल्ली को आधुनिक बना दिया, विकासपुरी, उत्तम नगर, गांधीनगर, शहादरा जैसे दिल्ली के उप शहर बिहारियों की बदौलत विकसित हुए और बिहारियों की बदौलत ही उनकी पहचान बनी। दिल्ली में सिर्फ बिहार के 20 प्रतिशत से अधिक वोटर हैं। जब चुनाव का समय आता है तो सेवा कार्य की झड़ी लग जाती है। 

लेकिन जब कोरोना ने विकराल रूप ले लिया, सरकार ने लोगों को बचाने के लिए लॉकडाउन कर दिया तो दिल्ली के मूल निवासी, दिल्ली की सरकार और राजनीतिक दलों ने बिहारी श्रमिकों से किनारा कर लिया। उन्हें ना तो खाने की समुचित व्यवस्था दी गई, ना रहने दिया गया। जिसके कारण 25 मार्च को लॉकडाउन होने के बाद से ही प्रवासी अपने घर की ओर चल पड़े और घर की ओर चलने का सिलसिला जारी है। 

लगातार गांव पहुंच रहे प्रवासी बहुत कुछ कह रहे हैं, इन प्रवासियों का सबसे अधिक गुस्सा दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार पर है। हालांकि किसी भी राजनीतिक दलों ने भूखे प्यासे बिहार के लोगों की मदद नहीं की। वह तो भला हो दिल्ली में रहकर राजनीति कर रहे बिहार के कुछ लोगों का, भाजपा के कुछ जमीनी कुछ जमीनी कार्यकर्ताओं का, जिन्होंने इन लोगों की हर संभव सहायता की। 

विकासपुरी से लौटे दिहाड़ी मजदूर विजय पासवान, भोला पासवान, ठेला चालक सीताराम महतों, गोकुल महतों, अरविंद साह आदि कहते हैं कि दिल्ली के 20 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में कौन बनेगा विधायक यह निर्णय हम बिहार के लोग करते हैं। हम बिहार के लोगों के भरोसे ही सत्ता का संघर्ष होता है। लेकिन जब दुख भरे दिन आए तो सब ने हमें भुला दिया, ठुकरा दिया। चुनाव के समय बिहार के लोगों के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती हैं, लेकिन दुख की बेला में किसी ने साथ नहीं दिया। दुख की बेला में किसी ने साथ नहीं दिया तो सुख में हम दिल्लीवासियों का साथ नहीं देंगे। 

गांव में रहेंगे, कुदाल-खुरपी चलाएंगे, मांग कर खाएंगे, दिल्ली नहीं जाएंगे। साल-दो साल तक बिहार की सरकार द्वारा रोजी रोजगार की व्यवस्था नहीं होने पर दिल्ली गए तो अपने बिहारी बाहुल्य विधानसभा क्षेत्र का विधायक अपने बिहार का बेटा बनेगा, दिल्ली का बेटा नहीं। पिछला चुनावी रिकार्ड बताता है कि हम बिहारी जिस के पाले में गए उसने चुनाव जीता। दिल्ली में कंप्यूटर ऑपरेटर का काम करने के साथ-साथ वहां के स्थानीय राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले जितेंद्र कुमार बताते हैं कि विकासपुरी, उत्तम नगर, आदर्श नगर, बदरपुर, करवाल नगर, लक्ष्मी नगर, गांधी नगर, शहादरा, पालम और रिठाला समेत 20 से अधिक क्षेत्रों में बिहार के अधिकतर लोग रहते हैं चुनाव में इनकी संख्या निर्णायक है। 

दिल्ली विधानसभा करीब डेढ़ करोड़ वोटरों में हम 20 प्रतिशत से अधिक हैं। सभी पार्टियों की नजर इसी वोट बैंक पर रहती है, लेकिन जब विपत्ति आया तो सब ने किनारा कर लिया। अब दिल्ली ना तो कंप्यूटर चलाने जाएंगे और ना ही राजनीति करने। अपने गांव में रहकर यहीं अच्छा काम खोज कर करेंगे और समाज को प्रगति के पथ पर ले जाएंगे, राजनीति भी करनी होगी तो यहीं करेंगे। 

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