संजीवनी टुडे

अहमदाबाद से आये प्रवासी कामगार अब मनरेगा में बहायेंगे पसीना

संजीवनी टुडे 05-06-2020 16:33:09

गुजरात के अहमदाबाद और सूरत से पलायन कर खाली हाथ लौटे प्रवासी मजदूर अब यहां अपने गांव में मजदूरी करने के लिये पसीना बहायेंगे।


हमीरपुर। गुजरात के अहमदाबाद और सूरत से पलायन कर खाली हाथ लौटे प्रवासी मजदूर अब यहां अपने गांव में मजदूरी करने के लिये पसीना बहायेंगे। कई प्रवासी मजदूर तो परिवार को पालने के लिये इधर उधर काम भी करना भी शुरू कर दिया है। ये मजदूर गुजरात का नाम सुनते ही मायूस हो जाते है क्योंकि लाँक डाउन में परदेश में इन्हें भारी मुसीबतें झेलनी पड़ी है। 

जनपद के कुरारा क्षेत्र के मनकी खुर्द गांव निवासी राधा किशन, किशन, लक्ष्मीनारायण. देवेन्द्र, अरविन्द, दिलीप, बारे लाल अपने परिवार के साथ गुजरात के सूरत में मजदूरी करने कई साल पहले गये थे। ये  सभी प्रवासी सूरत के कुबेर नगर में रहते थे। इसी गांव के एक दर्जन से अधिक लोग भी वहां धागा फैक्ट्री में काम करते थे। महीने में 15 से 20 हजार रुपये हाथ में आने से ये प्रवासी अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे थे मगर कोरोना वारयस को लेकर हुये लाँक डाउन में इन प्रवासियों के बुरे दिन शुरू हो गये। 

लाँक डाउन के बीच प्रवासी मजदूर अपने परिवार के साथ वहां से पैदल ही निकल पड़े। दो दिन तक पैदल चलने के बाद मध्यप्रदेश के बार्डर में जिला झबुआ में इन सभी प्रवासियों को एक विद्यालय में क्वारंटाइन किया गया। क्वारंटाइन अवधि बीतने के बाद सभी प्रवासी सरकारी बस से अपने गांव लौटे। गुजरात से ये सभी प्रवासी खाली हाथ लौटे है। क्षेत्र में अभी सैकड़ों प्रवासी कामगार ऐसे है जो अभी क्वारंटाइन पर वक्त काट रहे है वहीं तमाम प्रवासी क्वारंटाइन की अवधि बीतने के बाद भी अपने घरों में बैठे है। माया नगरी से लौटकर अपने गांव मनकी खुर्द आये फिल्मी कलाकार सोमेन्द्र कुमार का कहना है कि सूरत और अहमदाबाद से लौटे प्रवासियों का मन परदेश से ऊब चुका है।

लाँक डाउन में घर वापसी में आयी मुसीबत को अभी ये लोग भुला नहीं पा रहे है। झलोखर गांव में निगरानी समिति के सदस्य सत्येन्द्र अग्रवाल का कहना है कि अहमदाबाद और सूरत से लौटकर आये प्रवासियों में तमाम लोग मनरेगा में काम कर रहे है। गांव में मनरेगा इन प्रवासियों के लिये संजीवनी साबित हो रही है। 

19 हजार रुपये की नौकरी हाथ से जाने से प्रवासी मायूस
झलोखर और मनकी खुर्द गांव के तमाम गरीब लोग अहमदाबाद के  नारोल शहर में एक कपड़ा मिल नौकरी करते थे। संतोष कुमार अपनी पत्नी पार्वती और पुत्री निशा के साथ पिछले पांच सालों से वहीं पर किराये के मकान में रहकर अपनी गरीबी दूर कर रहे थे। इस दम्पति को महीने में 19 हजार रुपये की पगार मिलती थी। लेकिन लाक डाउन में मिल बंद होते ही इन प्रवासियों के बुरे दिन शुरू हो गये। लाँक डाउन के दौरान ये प्रवासी वहां से पलायन कर खाली हाथ लौटे है। अब ये अपने ही गांव में क्वारंटाइन की अवधि बिताने के बाद परिवार को पालने के लिये मजदूरी कर रहे है। संतोष सहित अन्य मजदूरों ने बताया कि इस कोरोना वायरस महामारी ने हम जैसे तमाम मजदूरों के अरमानों पर पानी फेर दिया है। 

दो सौ रुपये की मजदूरी में फावड़े चला रहे प्रवासी
कुरारा क्षेत्र के मनकी खुर्द गांव निवासी रमेश, सोबरन, प्रेमशंकर, भारत, कालका गुजरात के सूरत से लौटने के बाद अब परिवार के भरण पोषण के लिये मिट्टी की खुदायी कर रहे है। इन प्रवासियों को दो सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब मजदूरी दी जा रही है। दो वक्त की रोटी के लिये ऐसे समय में मजबूर मजदूर दिन भर फावड़े चलाकर पसीना बहा रहा है।  प्रवासियों ने बताया कि सूरत में धागा फैक्ट्री में मशीन चलाकर हर महीने 20 हजार रुपये की पगार पाते थे लेकिन अब इन सभी प्रवासियों को महीने में ढाई से तीन हजार रुपये ही हाथ में आ रहे है। परेशान प्रवासियों का कहना मजदूरों की यहीं मजदूरी है जिसे कोई समझ भी नहीं पा रहा है। ऐसे समय में फावड़े उठाने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है। 

मुसीबत के समय परदेश में किसी ने नहीं की मदद
गुजरात से सूरत से लाँक डाउन के बीच गांव लौटे  पंकज, राजबहादुर, प्रदीप कुटार, श्रीलाल व उसकी पत्नी शांति, रावेन्द्र तथा उसकी पत्नी संतोषी सहित तमाम प्रवासी मनकी खुर्द गांव में क्वारंटाइन की अवधि बिताने के बाद भी खाली बैठे है। प्रवासियों ने बताया कि परदेश में अच्छा पैसा मिलता था लेकिन लाँक डाउन में परदेश में मजदूरों की लाचारी पर किसी को दया नहीं आयी। यदि वहां मजदूरों को रहने और खाने का इंतजाम होता तो शायद कोई भी पलायन नहीं करता। फैक्ट्री मालिकों ने भी मुसीबत के समय दरवाजे बंद कर दिये। प्रवासियों ने फैक्ट्री मालिक बुलायेंगे भी तो लेकिन अभी दो तीन साल तक परदेश जाने का कोई इरादा नहीं है। 

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