संजीवनी टुडे

विश्व आदिवासी दिवस के मायने

संजीवनी टुडे 08-08-2020 22:08:31

राजस्थान में पहली बार विश्व आदिवासी दिवस पर राज्य स्तरीय अवकाश स्वीकृति हुआ है।


जयपुर। राजस्थान में पहली बार विश्व आदिवासी दिवस पर राज्य स्तरीय अवकाश स्वीकृति हुआ है। हमें यह समझना होगा कि इस अवकाश के क्या मायने हैं? इस अवकाश का क्या मतलब है। इस दिन का मतलब है- एक दिन अपनी सिंधु घाटी की जड़ों की तलाश करते हुए, अपने पुरखों को याद करते हुए अपने स्वर्णिम इतिहास के महत्त्व को याद करना। इस एक दिन का मतलब है- आप आपके जीवन के इस दिन को साल के सबसे बड़े पर्व के रूप में मनाओ ताकि आपके आसपास के लोग आपसे पूछें कि आज क्या है? और फिर आप उन्हें जो कुछ बताओगे उससे उनमें जागृति आएगी। और यही तो असल मकसद है कि आप स्वयं को पहचानों। यह अवकाश आपकी पहचान, आपके अस्तित्व और अस्मिता से जुड़ा है। यह अवकाश आपके महत्त्व को रेखांकित करता है। यह अवकाश उन लोगों के लिए है जो किसी देश के मूल निवासी हैं। मूल निवासी का मतलब है Indigenous और इसी से देश का नाम पड़ा था- India. सिंधु घाटी सभ्यता देश की सबसे पुरानी मानव सभ्यता थी। सिंधु नदी के किनारे छोटे-बड़े कई शहर बसे हुए थे। उसी में एक शहर था- मीनाद। नदियों के मैदानी क्षेत्रों की तलाश में घूम रही अन्य प्रजातियों ने इस सभ्यता पर हमला किया और इन्हें खदेड़कर वहां से विस्थापित कर दिया गया। फिर आदिवासी अरावली पर्वत श्रृंखलाओं में आकर बस गए और फिर से जंगलाती जीवन उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। डॉ.जी.एन. शर्मा के अनुसार, “The ranges of the aravalis with their hills and valleys naturally become the sheltering home for the number of tribes like bhils and minas since time immorial. By virtue of their living in the hills, they became the mountaineering tribes and developed a special technique of their own to fight against heavy odds. The Guerila technique as it was called, this became the special method of warfare.” 

कई वर्षों तक अरावली क्षेत्र में रहने के उपरांत मीना/मीणा आदिवासी समुदाय पूर्वी राजस्थान की ओर बढ़ने लगा। वर्तमान में यह समुदाय राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि संघ राज्यों में निवास करता है। राजस्थान में मीणा समुदाय को मीना, मीणा, Mina, Meena, Minavars or Fishman, मेव, रावत, मेराती, चीता आदि नामों से पहचाना जाता रहा है। कालांतर में छपन्या के अकाल और उससे जनित बेकारी, भुखमरी तथा सामंती अत्याचारों ने उन्हें राज्य से बाहर जाने के लिए विवश कर दिया। जयपुर के राजा की सैना में हजारों की संख्या में मीणा सैनिक भर्ती थे। मुग़ल-मराठा संग्राम के दौरान हजारों की संख्या में वे महाराष्ट्र गए तथा वहीं जाकर बस गए। इनमें से कई अपने नाम के साथ परदेशी, राजपूत आदि सरनेम का प्रयोग करने लग गए। 

महाराष्ट्र के औरंगाबाद, जलगाम, अमरावती, वर्धा, सेवाग्राम आदि अंचलों पर बहुसंख्यक रूप से मीणा समुदाय निवास करता है। इसी प्रकार छपन्या के अकाल के समय मालवा की ओर विस्थापन हुआ। इनमें से कई स्थाई रूप से मध्यप्रदेश में जाकर बस गए। रोजगार की तलाश में कई सैकड़ों आदिवासी परिवार उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, वृंदावन रोड और आगरा के आसपास जाकर स्थाई रूप से बस गए। बुलंदशहर अंचल में स्थाई रूप से निवास कर रहे आदिवासी अब वहां स्थाई रूप से खेती करते हैं। तथा अब भी अपनी परंपरा का पालन करते हैं।

वहां से कई हजारों पूर्वज पूर्वी राजस्थान में चले गए। फिर पूर्वी राजस्थान से कई हजारों पूर्वज मुगल मराठा संग्राम में सेना के रूप में कार्य करते हुए महाराष्ट्र और छपन्या के अकाल में कई हजारों पूर्वज मध्यप्रदेश चले गए। हमें हमारी असल जमीन से विस्थापित किया जाता रहा।

औपनिवेशिक दौर में आदिवासियों का पहला संघर्ष ब्रिटिश सत्ता के विरोध में होता है। उनसे भी तब तक संघर्ष नहीं किया जब तक कि उन्होंने इनके शांत जीवन में दखल नहीं दी। मिजो विद्रोह से लेकर नागारानी गाईदिल्ल्यु तक आदिवासियों ने लगभग 42 आंदोलन किए। पलामू विद्रोह (सन् 1770-71), खानदेश आंदोलन (सन् 1817-1846 राजस्थान में भील जनजाति द्वारा), संथाल विद्रोह (30 मार्च 1855-1857, संथाल परगना, झारखण्ड, छोटा नागपुर क्षेत्र में संथाल जनजाति द्वारा), बिरसा मुंड़ा आंदोलन (सन् 1890-1907-मुंड़ा जनजाति द्वारा), मानगढ़ आंदोलन (07 नवम्बर 1913 भील-मीणा आदिवासियों द्वारा), नागारानी गाईदिल्लयू (सन् 1932-47) प्रमुख आदिवासी आंदोलन हैं। इतिहास की पुस्तकों से आदिवासी नायकों को स्थान नहीं दिया गया। राजस्थान के सबसे बड़े आंदोलन (मानगढ़ आंदोलन, 17 नवंबर, 1913) में लगभग 1500 आदिवासियों ने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आदिवासियों पर विजय प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों ने एक सोची समझी रणनीति के तहत बारी-बारी से तीन मुख्य कदम उठाए। सबसे पहले लॉर्ड कार्नवालिस ने 1793 ई. में भूमि के स्थाई बंदोबस्त की प्रणाली लागू की, जिसके तहत आदिवासियों से जंगल छूट गया और जंगलों से निकलकर स्थाई रूप में खेती करने लगे। जिन-जिन क्षेत्रों में आदिवासियों ने जंगल से निकलकर स्थाई खेती की वहां उनका शोषण दूसरे आधारों पर होने लगा। उनके जीवन में विभिन्न कर (Tax) आये। सेठ, साहूकारों से सामना हुआ। उनसे जबरन नील की खेती कराई जाती   थी। उनके धान, गेहूं के खेतों में अंग्रेजों के सुअर चरते थे। अलवर के आदिवासी किसानों के आंदोलन का प्रमुख कारण यही था। विरोध करने पर उन्हें कोडें पड़ते थे। इस प्रणाली से आदिवासियों को बेगारी की समस्या का सामना करना पड़ता था। अंग्रेज उनसे बेगार करवाते थे। आदिवासी महिलाओं का शारीरिक शोषण भी इसी समय अधिक होने लगा था। इस समय के उपरांत आदिवासी आंदोलन तेज होते गये।

1850 ई. तक आते-आते आदिवासी इस व्यवस्था से परेशान हो गये। इसके बाद सिद्धू-कान्हू का आंदोलन हुआ। अब आदिवासी अपनी पारंपरिक जंगल की जीवन व्यवस्था में वापस लौटना चाहते थे। कुछ अंचल के आदिवासी मैदानों से जंगलों में पलायन करने लगे। इसी समय 1865ई. में ब्रिटिश सरकार का पहला वन अधिनियम कानून आया। अंग्रेजों की यह दूसरी बड़ी चाल थी। इस कानून के तहत जंगल की वस्तुओं के एकत्रीकरण की छूट को नियमित करने का प्रयास किया गया। इससे आदिवासियों की वस्तु-विनिमय प्रणाली सर्वाधिक प्रभावित हुई। आदिवासियों पर जंगल दोहन के कई झूठे मुकदमे भी इसी समय तेजी से लगने लगे। इस समय तक कुछ आदिवासी जंगलों में रहते थे और कुछ मैदानी भागों में रहते थे।

उपनिवेश काल में आदिवासी जीवन की तीसरी महत्त्वपूर्ण घटना ब्रिटिश सरकार द्वारा लाया गया एक अन्य कानून था। यह कानून था, ‘आपराधिक-जनजाति अधिनियम (सीटीए) 1871ई.’। यह कानून सर्वप्रथम 12 अक्तूबर को बोम्बे प्रेसीडेंसी में लागू हुआ। इस कानून का अर्थ था आदिवासी अपने जन्म से अपराधी पैदा होता है। इस कानून का निर्माण किसी खास उद्देश्य से हुआ, यह कहा नहीं जा सकता। इस कानून के तहत आदिवासी को अपनी प्रतिदिन की हाज़िरी (उपस्थिति) थाने में देनी होती थी। यदि कोई व्यक्ति किसी काम से दूसरे स्थान पर जाता तब उसे संबंधित थाने में सूचित करना होता था। इसके बाद उन्हें ख़ानाबदोश, अर्ध ख़ानाबदोश और अन-अधिसूचित जनजातियों के रूप में संदर्भित किया गया।

इस कानून के तहत जिस व्यक्ति अथवा जाति का नाम इस अधिनियम में है और वह देश की सीमा के बाहर है तब उसे अन्दर नहीं आने दिया जाता था। घोषित आपराधिक जनजाति के स्थायी निवास को स्थानीय सरकार द्वारा परिवर्तित भी किया जा सकता है। इस कानून की आड़ में आदिवासियों पर अनेक प्रकार के जुल्म किये जाने लगे। उन्हें अकारण थानों, चौकियों और जागीरदारों के गढ़ में बुलाकर प्रताड़ित किया जाता था। आदिवासियों को सजा देने के क्रम में जातिवाद और वर्ण व्यवस्था को भी बढ़ावा मिल रहा था। धीरे-धीरे एक कौम दूसरी कौम को हेय दृष्टि से देखने लगी।

इसके उपरांत दूसरे ‘वन अधिनियम कानून-1878ई’. के तहत आदिवासियों के जीवन से जंगल कोसों दूर कर दिया गया। इस कानून के तहत वनों में मवेशियों को चराने पर रोक लग गयी। अब आदिवासी जंगलों में प्रवेश भी नहीं कर सकते  थे। इस कानून के तहत आदिवासी अपने जीवन-यापन के लिए वनों से सूखी लकड़ी भी नहीं ले सकते थे। यदि कोई आदिवासी वनों में या उसके आस-पास देखा जाता तब उस पर वनों के दोहन का कठोर मुकदमा चलाया जाता था।

‘1894ई. की पहली वन-नीति’ आदिवासियों के लिए थोड़ी हितकारी थी। इसमें उपभोग की सीमा तय की गयी। भारत वन अधिनियम 1927 ई. में वनों पर राजकीय नियंत्रण बढ़ाया गया। इसके तहत कई कानून बने जिनको तोड़े जाने पर कठोर जुर्माने की व्यवस्था की गयी। 1933ई. के अधिनियम के तहत वनों को राज्य सूची में शामिल कर दिया गया।

स्वतंत्र भारत की पहली राष्ट्रीय वन-नीति 1952ई. में बनी। इसमें आदिवासियों को कोई अधिकार नहीं दिया गया, लेकिन निःशुल्क पशु चारण, खेती के लिए पानी का अधिकार, घरेलू कार्यों के लिए मिट्टी और पत्थरों को ले जाने का अधिकार उन्हें दिया गया। इस वन-नीति के तहत आदिवासियों को सूखी लकड़ी एकत्रित करने का अधिकार वापस मिल गया था।

इसके उपरांत दूसरे ‘वन अधिनियम कानून-1878ई’. के तहत आदिवासियों के जीवन से जंगल कोसों दूर कर दिया गया। इस कानून के तहत वनों में मवेशियों को चराने पर रोक लग गयी। अब आदिवासी जंगलों में प्रवेश भी नहीं कर सकते  थे। इस कानून के तहत आदिवासी अपने जीवन-यापन के लिए वनों से सूखी लकड़ी भी नहीं ले सकते थे। यदि कोई आदिवासी वनों में या उसके आस-पास देखा जाता तब उस पर वनों के दोहन का कठोर मुकदमा चलाया जाता था। 

‘1894ई. की पहली वन-नीति’ आदिवासियों के लिए थोड़ी हितकारी थी। इसमें उपभोग की सीमा तय की गयी। भारत वन अधिनियम 1927 ई. में वनों पर राजकीय नियंत्रण बढ़ाया गया। इसके तहत कई कानून बने जिनको तोड़े जाने पर कठोर जुर्माने की व्यवस्था की गयी। 1933ई. के अधिनियम के तहत वनों को राज्य सूची में शामिल कर दिया गया।

स्वतंत्र भारत की पहली राष्ट्रीय वन-नीति 1952ई. में बनी। इसमें आदिवासियों को कोई अधिकार नहीं दिया गया, लेकिन निःशुल्क पशु चारण, खेती के लिए पानी का अधिकार, घरेलू कार्यों के लिए मिट्टी और पत्थरों को ले जाने का अधिकार उन्हें दिया गया। इस वन-नीति के तहत आदिवासियों को सूखी लकड़ी एकत्रित करने का अधिकार वापस मिल गया था। 

इसके उपरांत वनों से जुड़े कई आयोग और कानून बने, लेकिन आदिवासियों को उनका पारंपरिक अधिकार नहीं मिला। सन् 1970 के दशक से इन क्षेत्रों का अंधाधुंध दोहन होने लगा। कई बड़ी औद्योगिक कंपनियाँ इन क्षेत्रों में स्थापित की गयी। आज स्थिति यह है कि क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन के उत्पादन में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। देश की संस्कृति भी बदली है। एक तरफ जंगलों और आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ विश्वविद्यालयों में छोटे-छोटे पौधे लगाकर पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी वृक्षों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। 

आदिवासियों का जंगलों से रचाव और बचाव का संबंध रहा है। आदिवासियों की परंपरा में जंगलों को उजाड़ना नहीं बल्कि उनकी हिफ़ाजत करना रहा है। हरे वृक्षों को काटना पाप माना जाता रहा है। औषध वनस्पतियों के पौधों को समूल उखाड़ना प्रकृति की सत्ता के विरुद्ध अपराध माना गया है। अत्यावश्यक होने पर कोई हरी टहनी काटनी पड़े तो उससे पहले वृक्ष से क्षमा याचना करने की प्रथा आदिवासियों में रही है। इमारती लकड़ी के नाम पर पत्तों और सूखी लकड़ियों का ही इस्तेमाल किया जाता है।

तिलका मांझी पहला भारतीय था जिसे अंग्रेजों ने फांसी दी थी। अंग्रेजों ने 13 जनवरी, 1785 को तिलका मांझी को बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी थी। इसी प्रकार के सैंकड़ों क्रांतिकारियों ने देश की आज़ादी में निस्वार्थ प्राण न्योछावर कर दिए। आधुनिक भारत के निर्माण में आदिवासियों का उल्लेखनीय योगदान रहा है। यह आदिवासी दिवस उन पुरखों के संघर्ष की याद में मनाया जाना चाहिए। आदिवासी जीवन-संघर्ष और आदिवासी जीवन-दर्शन को याद किया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ अपनी संस्कृति के संरक्षण की दिशा में भी अपेक्षित कदम उठाए जाने चाहिए। संस्कृति की रक्षा के लिए संस्कृति के माध्यमों की रक्षा करना आवश्यक है। मीणी भाषा पर अधिक से अधिक काम लिया जाना चाहिए। मीणी भाषा का संरक्षण करते हुए ही हमारी सांस्कृतिक विरासत को संजोया जा सकता है। आदिवासियों की मुख्य विशेषता सामूहिकता की रही है। आदिवासी अपना प्रत्येक काम हमेशा समूह में करते आए हैं। इसलिए सामूहिकता के हित में सकारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए। >डॉ. पिंटू कुमार मीणा

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