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मेवाड़ के गांवड़ापाल की होली: बारह ढोल, बारह कुंडियां और बारह झालरों की झनकार के साथ होती है तलवारों की गेर

संजीवनी टुडे 09-03-2020 12:49:43

शौर्य का प्रतीक मेवाड़ के गांवड़ापाल की होली, जनजाति महिलाएं को उत्सव की पूरी आजादी


-आदिवासी गीतों की ताल और लेजिम की खनक पर थिरकते हैं पैर 

-रंग बिरंगे कपड़ों व सिर पर चुन्दड़ वाले साफों के तुर्रे दिखाते हैं अकड़ 

उदयपुर। रंगीले राजस्थान की रंगीली संस्कृति में होली सिर्फ मस्ती का त्यौहार नहीं, शौर्य का प्रतीक भी है और मेवाड़-वागड़ क्षेत्र में तो होली पर प्रचलित परम्पराओं में यह बात आज भी झलकती है। महाराणा प्रताप के शौर्य और संघर्ष का इतिहास अपने में समेटे मेवाड़-वागड़ की होलिका दहन की परम्पराएं यहां के गौरव का परिचय देती हैं। ‘मेरा रंग दे वसंती चोला...’ जैसे देशप्रेम से ओतप्रोत गाने की पंक्ति मेवाड़-वागड़ की होलिका मंगल (दहन) परम्परा में घुली-मिली सी नजर आती है। 

ऐसे ही शौर्यपूर्ण संदेश से भरी एक होली है उदयपुर जिले की सलूम्बर तहसील के आदिवासी बहुल गांव गांवड़ा पाल की, जहां हनुमान मन्दिर के समीप मुख्य चौराहे पर होली दहन की जाती है। यह क्षेत्र की सबसे बड़ी और संवेदनशील होली मानी जाती है। गांवड़ा पाल की होली की पहचान क्षेत्र में उसकी अलग विशेषताओं के कारण सालों से चर्चा में रही है। इस त्यौहार पर वह हर युवा जो कहीं अन्यत्र रोजगार करते हों, होली पर गांव पहुंच ही जाते हैं। गांव में रौनक और होली की रेलमपेल सोमवार को पूर्णिमा पर सुबह से नजर आने लग गई। 

गांवड़ापाल मुख्य रूप से मीणा आदिवासियों का गांव है जिसमें बारह फले हैं। होली के दिन बारह फलों के निवासी हजारों लोग चौराहे पर सुबह से पारम्परिक वेशभूषा में गेर खेलना शुरू कर देते हैं। इसमें पुरुष सफेद धोती व कुर्ता पहनते हैं और सिर पर लाल चुन्दड़ वाला साफा बांधते है, जिस पर विशेष रूप से तुर्रा लगाया जाता है जो साफे को आकर्षक बनाता है। महिलाएं व युवतियां रंग बिरंगी ओढ़नियां ओढ़े आदिवासी विशेष वेशभूषा में रहती है। पुरुष तलवारों के साथ ढोल, मादल व कुण्डी की थाप और थाली की झनकार पर उमंग और उत्साह को साथ गेर खेलते हैं।

 थाप की ताल की गति बढऩे के साथ तलवारों की खनक भी बढ़ती जाती है, तलवारें तेजी से घूमती हैं, लेकिन मजाल है कि बाजू वाले को छू जाए। यही इस समाज की शौर्यता को दर्शाता है। दूसरी ओर, महिलाएं अलग-अलग झुण्ड बनाकर आदिवासी गीतों पर लेजिम की ताल पर आदिवासी नृत्य करते हुए अपनी मस्ती में झूमती रहती हैं। इसे हम महिला अधिकारों से जोड़ें तो कह सकते हैं कि आदिवासी समाज में बेटियों-महिलाओं को उत्सव को अपने तरीके से मनाने से रोका-टोका नहीं जाता। रोकने-टोकने या छेड़छाड़ जैसी कोई शिकायत आती है तो गांव के बुजुर्ग यानि पंच सख्त निर्णय लेते हैं और समाज के स्तर पर दण्ड भी देते हैं। 

holi

होलिका दहन के लिए गांव मुखिया (बारहों फलों का) जिसे गमेती कहते हैं, उसके हाथों होता है। किसी ओर को होलिका प्रज्वलन की अनुमति नहीं है। यहां की होली की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां खुले आम तलवारें, बरछी जैसे हथियारों के साथ होली की गेर खेलते हैं, लेकिन यहां किसी तरह की अनबन या वैरभाव को स्थान नहीं है। बुजुर्गों द्वारा निर्धारित सख्त नियमों के आधार पर झगड़ा करने वालों के खिलाफ कड़े दण्ड का प्रावधान है। साथ ही होली के दिन शराब का सेवन भी प्रतिबंधित है। फिर भी प्रशासन की ओर से सुरक्षा को लेकर व्यवस्था चाक चौबन्द की जाती है। 

नए जोड़े फिर लेते हैं सात फेरे 

-गांव में पूरे साल में शादी करने वाले नए जोड़े होलिका के फिर से सात फेरे लेते हैं। यहां मान्यता है कि होली पर फिर से फेरे लेने से अनिष्ट की आशंका नहीं रहती, परिवार में सुख व समृद्धि आती है। होली के दिन किसी महिला या युवती से किसी प्रकार की छेड़छाड़ या अभद्रता करने वालों पर भी बुजुर्गों द्वारा नियमानुसार कड़ा दण्ड दिया जाता है। इसके लिए पहले ही सूचना करवा दी जाती है। हजारों की संख्या होने के बावजूद महिलाएं व युवतियां बेहिचक गेर नृत्य का आनन्द लेती हैं। उन्हें कोई रोक टोक व परेशानी नही होती। 

बारह फलों के बारह ढोल, बारह कुण्डी व बारहों थाली एक साथ बजती हैं, जिनके लय और ताल पर एक तरफ गेर खेलते युवाओं की कतार चलती है तो दूसरी ओर युवतियों की गीतों के साथ नृत्य की थिरकन चलती है। इस होली के दिन में दहन होने की वजह से आसपास के सैंकड़ों गांवों के लोग भी देखने पहुंचते हैं। विधायक से लेकर कई जनप्रतिनिधि व पुलिस-प्रशासन के अधिकारी भी मौजूद रहते हैं। होलिका दहन का समय पूर्व निर्धारित रहता है। 

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