संजीवनी टुडे

चित्रकूट की ऐतिहासिक शान, अनदेखी के कारण खो रहा पहचान

संजीवनी टुडे 09-05-2019 14:27:54


चित्रकूट। एक तरफ जहां प्रदेश की भाजपा सरकार ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों को सहेजने का दावा कर रही है, वहीं भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट की ऐतिहासिक धरोहरें पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण ध्वस्त होने के कगार पर हैं। अपेक्षित प्रचार-प्रसार न होने के कारण ये धरोहर पर्यटकों की निगाहों से भी दूर हैं। इससे पर्यटन उद्योग को धक्का लगने के साथ ही युवाओं को रोजगार मिलने की संभावनाएं भी क्षीण होती दिख रही हैं। इससे क्षेत्र के युवाओं का पलायन नहीं रूक रहा है।

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भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट में मराठा शासक बाजीराव पेशवा के वंशज विनायक राव पेशवा द्वारा बनवाया गया ’गणेश बाग’ पर धूल की परतें जमी हुई हैं। यह सात खंडों में बना गणेश बाग हिन्दुओं के लिए आस्था का विषय है और हिन्दू समाज को अपने गौरव की भी याद दिलाता है लेकिन सरकार की नजरें इस पर कब इनायत होंगी, यह सोचनीय पहलू है।

बेसिन संधि के बाद मिली थी जागीर
मुम्बई में हुई बेसिन संधि के बाद कर्वी (चित्रकूट) की जागीर मराठों को मिली थी। इसके बाद मराठा शासक बाजीराव पेशवा के वंशज विनायक राव पेशवा ने खजुराहो की तर्ज पर एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में गणेश बाग का निर्माण लगभग 1828 ई. में कराया था।शिल्पकारी का अद्भुत और बेजोड़ नमूना होने के कारण चित्रकूट के गणेश बाग को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में 'मिनी खजुराहो' के नाम से भी जाना जाता है। यहां की सात खंडों की बावली भी दर्शनीय है। यहां गणेश बाग के साथ पुरानी कोतवाली किला, गोल तालाब और नारायण बाग भी बनवाया गया था।

गणेश बाग की दीवारों की मूर्तियां करती हैं आकर्षित
गणेश बाग की दीवारों को बारीकी से काटकर देवी देवताओं की मूर्तियों को गढ़ा गया है। एक खूबसूरत तालाब के किनारे बनाए गए इस षटकोणीय पंच मंदिर में नागर शैली के दर्शन होते हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर की गई चित्रकारी में कहीं सात अश्वों के रथ पर सवार सूर्यदेव हैं, तो कहीं विष्णु हैं तो कहीं अन्य देवी देवताओं का समूह है। मंदिर में इस्तेमाल की गई नागर शैली के कारण ही गणेश बाग को 'मिनी खजुराहो' की संज्ञा दी जाती है। नागर शैली की विशेषता है कि ऊंची जगत बनाकर मूर्ति बनाई जाती है।

अराजक तत्वों ने खजाने की लालच में कर दी खुदाई
इसी के बगल में एक चाहरदीवारी है, जिसे राजा ने घुड़सवारी के लिए बनवाया था, लेकिन शासन-प्रशासन एवं पुरातत्व विभाग की अनदेखी और उपेक्षा के चलते बावली और मैदान की दीवारें नेस्तनाबूत होने लगी हैं। खजाने की लालच में अराजकतत्वों ने गणेशबाग में खुदाई करके  इमारतों और बेशकीमती मूर्तियों की नुकसान पहुंचाया है। इसके बाद भी इस प्राचीन धरोहर की सुरक्षा एवं संरक्षण के प्रति पुरातत्व विभाग गंभीर नजर नहीं आ रहा है।

पर्यावरण चिंतक की नजर में गणेश बाग
इतिहासकार रमेश चौरसिया और पर्यावरण चिंतक अरूण कुमार गुप्ता बताते हैं कि गणेश बाग पर्यटन के नजरिये से चित्रकूट की शान है। पुरातत्व विभाग इसके संरक्षण का दावा तो करता है लेकिन इसके हालात देखकर ऐसा नहीं लगता। इतिहासकार चौरसिया बताते हैं कि राजा छत्रपाल से पेशवा बाजीराव प्रथम को बुंदेलखंड का तिहाई भाग उपहार में मिला तो मराठों ने यहां अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं। पर्यटन विकास के लिए संघर्ष करने वाले बुंदेलीसेना के जिलाध्यक्ष अजीत सिंह एवं समाजसेवी पंकज अग्रवाल बताते हैं कि गणेश बाग वास्तुकला का अदभुत नमूना है।

मराठा वंशज ने कहा
मराठा शासक रहे विनायक राव पेशवा की वंशज जयश्री जोग के मुताबिक मिनी खजुराहो के नाम से विख्यात गणेश बाग का निर्माण लगभग 18वीं-19वीं शताब्दी में विनायक राव पेशवा द्वारा करवाया गया था। मंदिर का आंतरिक हिस्सा खजुराहो की कला और शैली जैसा ही है। इसीलिए इसे मिनी खजुराहो कहा जाता है। इस धरोहर को संजोने का उपाय करना चाहिए।

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भेजी गयी है कार्य योजना
चित्रकूट के जिलाधिकारी विशाख का कहना है कि जिले की पुरातात्विक महत्व की धरोहरों को संरक्षित करना शासन-प्रशासन की प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि शासन को जिले की महत्वपूर्ण धरोहरों की सूची और उनके विकास की कार्ययोजना बनाकर भेजी गई है। जल्द ही मिनी खजुराहो के नाम से विख्यात गणेश बाग समेत जिले के सभी महत्वपूर्ण स्थलों का सुंदरीकरण करा पर्यटन विकास से जोड़ा जायेगा।

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