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पाठा के जंगलों की दुर्लभ वनस्पतियों को नष्ट करने मे जुटे वन माफिया

संजीवनी टुडे 29-05-2020 19:48:44

पाठा के जंगलों की दुर्लभ वनस्पतियों को नष्ट करने मे जुटे वन माफिया


चित्रकूट। औषधीय पौधों और जैव विविधता के लिए देशभर में विख्यात चित्रकूट के जंगल पर संकट के बादल घिरने लगे हैं। मुनाफाखोर इन जंगलों से गरीब मजदूरों को बरगलाकर लघुवन उपज के नाम पर विभिन्न वृक्षों व पौधों की छाल व जड़ें एकत्र करवाकर खासा मुनाफा कमा रहे हैं। जंगल से दुर्लभ वनस्पतियां नष्ट हो रही हैं। 

चित्रकूट के जंगल विंध्य के अभ्यारण वन औषधियों के लिए देशभर में विख्यात हैं। मजदूरों को वन उपज का सही ढंग से दोहन नहीं मालूम है। कम समय में अधिक लघु वन उपज एकत्र करने को वृक्षों को ही काटकर गिरा देने की परम्परा है। ऐसी स्थिति में वन औषधि से लबरेज वृक्ष नष्ट हो रहे हैं। बड़े अफसोस की बात है जिले के जंगल से अर्जुन के बहुउपयोगी औषधि वाले वृक्ष देखते-देखते कुछ वर्षों में विलुप्त हो चुके हैं। कई ऐसे अर्जुन के पेड हैं जो लगातार सूखते चले जा रहे हैं। वन विभाग कोई उपाय नहीं कर रहा है। 

 वन उपज के दोहन का सही तरीका न मालूम होने से कई ऐसे वृक्ष हैं जिनका पुनरोत्पादन रुक गया है। जो पुराने वृक्ष हैं, उन्हीं से बार-बार फल व पत्तों तथा बीज एकत्र किये जा रहे हैं। जब नये पौधे तैयार नहीं होंगे तो फिर जंगल का अस्तित्व कैसे बचेगा। होता ये है कि आंवला, हर्र, बहेरा जैसे औषधीय वृक्षों से उनका फल एकत्र करने को अज्ञानता में मजदूर मुनाफे के लिए पेड़ों अथवा मोटी शाखाओं को काटकर जमीन पर गिरा देते हैं। कटी शाखाओं से फल एकत्र करने के बाद उन्हें सुखाकर जलाऊ लकडी के रुप में बेंचते हैं। ये तरीका न बदला गया तो कुछ दिनों में सभी औषधीय वृक्ष गायब हो जायेंगे। 

 जैव विविधता संरक्षण को बायो डायवर्सिटी कानून बनाया गया है। इस एक्ट के लागू होने पर बाधित करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जा सकती है। जिले में इस एक्ट के तहत एक भी मामला आज तक दर्ज नहीं किया जा सका है। वन विभाग की लापरवाही से छोटे-मोटे स्वार्थ के लिए मजदूर जंगल के दुश्मन बन गये हैं। इस एक्ट को सख्ती से लागू किया जाये तो वन औषधियां बच सकती हैं। एक दौर था जिले के जंगल में काफी तादाद में मैदा के वृक्ष मिलते थे। अपनी गुणवत्ता व उपयोगिता के कारण वर्तमान में मैदा वृक्ष पूरी तरह लुप्त हो गये हैं। 

इस वृक्ष की छाल से अच्छी क्वालिटी का गोंद निकाला जाता था। कुछ व्यापारियों से आपूर्ति करने को क्षेत्रीय श्रमिकों को उकसाकर देखते ही देखते सभी मैदा के वृक्ष समाप्त करवा डाले। अब यह पेड़ जंगल के इतिहास में दर्ज हो गये हैं। कहीं देखने तक को नहीं मिलते। मैदा वृक्ष सूखने के बाद गांव में रहने वाले लोग पश्चाताप कर रहे हैं। मैदा वृक्षों के सूखने का कारण गोंद की लालच में आदिवासी कुल्हाडी से घाव बना देते हैं। यहीं से वृक्ष का पूरा तत्व गोंद के रुप में बाहर निकल जाता है और वृक्ष सूख जाता है। 

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