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चारा घोटाला मामला: जब लालू ने जेल में ही रहकर 100 से ज्यादा दिनों तक चलाई थी सरकार...

संजीवनी टुडे 27-11-2020 10:47:11

जेल से आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के कथित फोन कॉल के वायरल होने के पश्चात सियासी तूफान खड़ा हो गया है।


नई दिल्ली। जेल से आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के कथित फोन कॉल के वायरल होने के पश्चात सियासी तूफान खड़ा हो गया है।  बीजेपी का आरोप है कि लालू रांची में जेल के भीतर से ही बिहार में साल 2020 में चुनी गई NDA सरकार को गिराने की साजिश रच रहे हैं। अभी लालू के उस वायरल आडियो का सच तो छानबीन के पश्चात ही सामने आएगा। 

बता दें की, वर्ष 1997... ये वो समय था जब चारा घोटाले में लालू पर कानून का शिकंजा कस चुका था। अरबों रुपये के चारा घोटाले में उन्हें मुख्य साजिशकर्ता करार दिया गया था। गवर्नर अखलाकुर रहमान किदवई ने सीबीआई को लालू के विरुद्ध मुकदमा दायर करने की अनुमति दे दी थी। हालांकि जनता दल के बिहार के लगभग सभी विधायक उनके साथ थे। ऐसे में लालू ने एक नई चाल चली, उन्होंने जनता दल से ही स्वयं को भिन्न कर लिया और 5 जुलाई, 1997 को अपनी नई पार्टी RJD यानि राष्ट्रीय जनता दल का गठन कर लिया। इसके बाद बिहार विधानसभा में RJD ने बहुमत भी साबित कर दिया।

लेकिन राबड़ी को सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था।  लिहाजा लालू ने पूर्व सीएम होने और मशीनरी के भी हाथ में होने का लाभ उठाया। तब बीएमपी गेस्ट हाउस की अस्थाई जेल बन गई थी पावर सेंटर बोला जाता है कि साल 1997 के इन 135 दिनों तक लालू ने बीएमपी गेस्ट हाउस के अस्थायी कारागार से ही पूरी सरकार चलाई। 

एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उस वक्त हाल ये हो गया था कि अधिकारीयों को सचिवालय के साथ-साथ बीएमपी गेस्ट हाउस में भी हाजिरी बनानी पड़ती थी। सरकार की नीतियां लालू जेल में ही बैठकर तय कर रहे थे। वहीं पर हर फैसले का डॉक्यूमेंटेशन यानि कागजी खाका बनाया होता था, केवल मुहर तत्कालीन सीएम राबड़ी की होती थी। लालू के कुछ विश्वासी विधायकों ने तो बीएमपी गेस्ट हाउस के पास ही डेरा डाल दिया था। 

केवल मंडल कमीशन एवं बोफोर्स के मुद्दे पर वीपी सिंह के जनता आंदोलन से लालू लिफ्ट नहीं हुए। इसमें जंगलराज -1 की भूमिका भी थी। साल 1980 से 1990 के बीच बिहार अंधी खाई की तरह बन गया जिसमें पांच कांग्रेसी सरकारों ने गोते लगाए - जगन्नाथ मिश्र (जून 1980—अगस्त 1983), चंद्रशेखर सिंह (अगस्त 1983—मार्च 1985), (बिंदेश्वरी दुबे (मार्च 1985—फरवरी 1988), भागवत झा आजाद (फरवरी 1988—मार्च 1989), सत्येंद्र नारायण सिंह (मार्च-दिसंबर 1989) और फिर मिश्रा जी। इस बार मिश्रा जी बिहार से कांग्रेस की विदाई कराने ही लौटे थे। उधर कर्पूरी ठाकुर का सोशलिस्ट चेला लालू यादव कैपिटलिस्ट बनने की प्रतीक्षा कर रहा था। 

एक जमींदार हरिजन को सरकारी जमीन पर कब्जा दिलवाने में पुलिस ने सहायता की। इसके विरुद्ध मजदूर किसान संघर्ष समिति (MKSS)के बैनर तले हजारों हरिजनों ने आंदोलन प्रारंभ कर दिया। 19 अप्रैल,1986 का दिन था। भारी भीड़ अरवल पुलिस थाने के सामने प्रदर्शन कर रही थी। तभी सिर्फ तीन दिन पहले तैनात किए गए एसपी सीआर कासवन ने फायरिंग के ऑर्डर दिए। मिनटों में 21 हरिजनों की लाशें गिर गईं। परतु  उन्हीं की पार्टी के जगन्नाथ मिश्रा ने इसकी तुलना जालियांवाला बाग से कर दी। 

बता दें कि नवंबर 1980 में जगन्नाथ मिश्र के हाथों में राज्य की बागडोर आने के कुछ ही वक्त के पश्चात बिहार विधानसभा अवाक् रह गई, जब विपक्ष के कुछ सदस्य स्ट्रेचर पर एक घायल विधायक को लेकर सभा में आए। ये मुख्यमंत्री की ही पार्टी का था। 

मिश्र का उन्हें दंडित करने का तरीका था उनका पोर्टफोलियो बदलना। राजनीति का अपराधीकरण तथा जुर्म राजनीतीकरण हो चुका था। साल 1980 के चुनावों के बिल्कुल पहले कामदेव सिंह मुठभेड़ में मारा गया। बेगूसराय के कामदेव सिंह की पूरे सूबे से लेकर नेपाल तक तूती बोलती थी। राजनेताओं ने कतारबद्ध होकर उसे श्रद्धांजलि अर्पित की। 

पटना के इर्द-गिर्द के ग्रामीण नालंदा, गया, जहानाबाद, बेगूसराय, भोजपुर जैसे जिलों में गुप्त रूप से बंदूक के सैकड़ों कारखाने बन गए थे। हिंसा ने एक संप्रदाय का रूप ले लिया था। नेता लोग किराए के अपराधियों का उपयोग करते थे। प्रत्येक वस्तु का दाम फिक्स हो गया। 

सरकारी नौकरियों में तबादलों का दाम 20,000 रुपए था, नियुक्तियों की 25,000 रुपए और पदोन्नतियों की 50,000 रुपए थी। इस बात की पुष्टि कि जगन्नाथ मिश्र के शासन में भ्रष्टाचार ने एक लंबी छलाँग लगाई थी। बिहार के एक पूर्व सीएम अब्दुल गफूर ने बोला था कि, रिश्वत एकत्रित करने हेतु औपचारिक रूप से दुकानों की स्थापना करने की प्रवृत्ति जगन्नाथ मिश्र ने प्रारंभ की थी।

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