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आस्था, विश्वास और धार्मिक समन्वय का केंद्र है बाबा हरिगिरिधाम

संजीवनी टुडे 12-07-2019 14:18:31

आस्था, विश्वास और धार्मिक समन्वय का केंद्र है बाबा हरिगिरिधाम


बेगूसराय। भगवान भोले शंकर को समर्पित माह सावन की शुरुआत इस वर्ष 17 जुलाई से हो रहा है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग शिवालयों में जलाभिषेक कर सर्वकल्याण की कामना करते हैं। ऐसेे ही एक शिवालय, जिले में गढ़पुरा प्रखंड में स्थित बाबा हरिगिरिधाम की बड़ी मान्यता है। इस धाम पर आने वाली श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा व सुविधाओं की व्यवस्थाओं को लेकर तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। यह शिवालय आस्था और विश्वास का बड़ा केंद्र है।

कभी अंगुतराप और स्वर्णभूमि के नाम से प्रसिद्ध बेगूसराय जिलेे की उत्तरी सीमा पर गढ़पुरा प्रखंड मुख्यालय से महज एक किलोमीटर दूर स्थित पावन शिवालय बाबा हरिगिरिधाम आज मिथिला के देवघर के रूप में भी जाना जाने लगा है। इस शिवालय की ख्याति का आलम यह है कि यहां संस्कार कराने के लिए आने वालों की भारी भीड़ हमेशा ही रहती है। चन्द्रभागा नदी (अतिक्रमण के कारण विलुप्त) के पश्चिमी तट पर पौराणिक काल से स्थित इस शिवालय की महिमा वर्ष 2000 से काफी फैल गई। अब यहां प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं, तो वहीं एक हजार से भी अधिक मुंंडन, उपनयन और शादी समेत अन्य संस्कार कराने के लिए आते ही रहते हैं।

कथाओं के अनुसार श्मशान भूमि पर बाबा हरिगिरि नामक महात्मा के द्वारा स्थापित इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना उगना के साथ महाकवि विद्यापति ने भी जयमंगलागढ़ जाने के क्रम में की थी। इस पौराणिक स्थल की स्पष्ट चर्चा किसी धर्म ग्रंथ में नहीं है लेकिन ब्रह्मवर्त पुराण में मंगला देवी के संबंध में की गई चर्चा के साथ कहा गया है कि कमल दल से पूर्ण सरोवर के मध्य मंगला देवी का निवास है और उसी के उत्तर पूर्व दिशा की ओर शिव का वास है। मंदिर के बगल होकर चंद्रभागा नदी दक्षिण दिशा की ओर मुड़ जाती है। इसका बड़ा प्रमाण रुद्रयामल तंत्र एवं कालिका पुराण में मिलता है, जिसमें कहा गया है कि मिथिला एवं अंग देश की सीमा पर दक्षिणायन चंद्रभागा तट पर शिव आकर बसे हैं। जिसकी पूजा सप्त कुंड के जल से की जाती है तथा वही त्रिदंडी मुनियों का निवास है। सप्त कुंड और मुनियों के निवास के प्रमाण भी यहां हैं। हालांकि अब सिर्फ दो कुंड ही बचेे हैंं।

इस पौराणिक स्थल का नामकरण हरिगिरी धाम होने के संबंध में कहा जाता है कि पहले यहां घने जंगल के बीच तांत्रिक और अघोरियों का वास होता था। बगल से बहने वाली चंद्रभागा नदी की चिता भूमि पर सिद्ध महात्मा भी रहते थे। इनमें से हरिगिरी बाबा, तामरी बाबा और मनधारी बाबा की प्रसिद्ध थी तथा हरिगिरि बाबा ने इसकी स्थापना की थी। बाद के दिनों में इसका उन्नयन होने लगा और ख्याति बिहार के साथ बंगाल, आसाम और नेपाल तक काफी फैल गई।
आज हरिगिरी धाम महज एक मंदिर नहीं, आस्था, विश्वास, भाईचारा और धार्मिक समन्वय का केंद्र बन गया है। 

सावन में यहां सिमरिया घाट से गंगाजल लेकर पैदल, निजी वाहन एवं ट्रेन से भक्तजनों का कारवांं उमड़ पड़ता है। यहां श्रावणी मेला के साथ-साथ शिवरात्रि, माघी पूर्णिमा एवं कार्तिक पूर्णिमा मेला का आयोजन धूमधाम से किया जाता है। फिलहाल सावन आने में मात्र चार दिन शेष हैं तो शिव भक्तों के स्वागत की जोरदार तैयारी हो रही है। जिला प्रशासन सुरक्षा और सुविधा के लिए व्यापक बंदोबस्त करने की व्यवस्था कर रहा है।

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