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आपात काल के 44 साल: मैं रहूं या न रहूं, मां के दूध का कर्ज चुकाते रहना: शंभुनाथ

संजीवनी टुडे 25-06-2019 14:01:33

आपात काल के 44 साल


लखनऊ। नौ अगस्त 1975 का वह दिन याद है, जब मुझे जेल से सीजीएम कोर्ट में पेश करने के लिए लाया गया। कचहरी परिसर में ही मैंने जोश भरने की नीयत से भाषण दिया कि अटल जी, राजनारायण जी, जेपी जी की हत्या करा दी गयी है लेकिन आप लोग घबराइये नहीं, इंदिरा गांधी भी सड़क पर ही काटी जाएंगी। इसके बाद के परिणामों से तो मैं पहले से ही अवगत था और जेल में जाने के बाद जब मैं साथी कैदियों के बीच रामायण पढ़ रहा था, तभी सूचना मिली कि जिलाधिकारी मिलने के लिए आये हैं। सूचना मिलते ही साथी फूट-फूटकर रोने लगे। मैंने कहा, आंसू न बहाओ मैं रहूं या न रहूं लेकिन आप लोग जिंदा रहने तक भारत मां की लाज रखना। 

आपात काल देश के इतिहास में काला धब्बा
1975 के दौरान मीसा बंदी रहे गाजीपुर के रहने वाले लोकतंत्र सेनानी शंभुनाथ राय ने बताया कि आपात काल देश के इतिहास में एक काला धब्बा है। अंग्रेजों के जमाने में भी उतनी हठधर्मिता नहीं थी, जितनी इंदिरा गांधी हठधर्मी थीं। आपात काल की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि 18 जनवरी 1975 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा आने वाले थे। उनको काला झंडा दिखाने की तैयारी थी। मैं 17 जनवरी को दिलदार नगर में और रमाकांत जमानियां में भाषण दे रहे थे लेकिन दोनों लोगों काे गिरफ्तार लिया गया। इस पर संघ के विचारक व अधिवक्ता ज्ञानचंद द्विवेदी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में गिरफ्तारी पर बंदी प्रत्यक्षीकरण का रिट दाखिल कर दी तो हमें इलाहाबाद नैनी जेल भेज दिया गया, जहां पर नेहरू वार्ड में रखा गया था। 

उसी समय लखनऊ में अप्रैल माह में किसानों के प्रदर्शन के दौरान राजनारायण की गिरफ्तारी हुई तो उन्हें भी नैनी जेल के नेहरू सदन में लाया गया। तब मुझे मालवीय सदन में भेज दिया गया। उसके पांच दिन बाद ही अटल बिहारी वाजपेयी भी नैनी जेल में आ गये। उसी दौरान दोनों लोगों से घनिष्ठ संबंध हो गये। इसी दौरान पांच मई 1975 को मैं रिहा हो गया। 

आपातकाल लगते ही हाे गया था भूमिगत
उसी समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की कोर्ट में इंदिरा गांधी के खिलाफ याचिका की सुनवाई चल रही थी और 12 जून 1975 को वे भ्रष्टाचार में दोष सिद्ध हो गईं। 24 जून को दिल्ली में जब राजनारायण जी गिरफ्तार हो गये तो सब लोग तुरंत भूमिगत हो गये। शंभुनाथ राय ने बताया कि 25/26 की रात को आपात काल लगते ही मैं भी भूमिगत हो गया। उस समय आंदोलन से जुड़े किसी भी व्यक्ति को दिन में चलने से मनाही थी। हर व्यक्ति अपना नाम बदल चुका था। मैं तो गेरूआ वस्त्र पहनकर साधू के वेश में रहता था। सभी लोग रात को ही चलते थे और दिन में किसी गांव में छुपे रहते थे। मेरा केंद्र मुहम्मदाबाद था। 26 जुलाई 1975 को चार बजे भोर में मुहम्मदाबाद से गाजीपुर चला आया। मैं जब कपड़े बदल रहा था, तभी सीआईडी का दारोगा केशव यादव आ गया और मुझे गिरफ्तार कर लिया। 

कहा था, अटल जी की करा दी गयी हत्या
9 अगस्त 1975 को जेल से सीजीएम कोर्ट में पेशी थी। उसी समय पुलिस कस्टडी में कचहरी परिसर में ही मैंने भाषण दिया, मित्रों जंगी सलाम, सूचना मिली है कि अटल बिहारी वाजपेयी, राजनारायण और जेपी की हत्या करा दी गई है लेकिन विश्वास दिलाता हूं कि इंदिरा गांधी भी उसी तरह काटी जाएंगी, जैसे दूसरी आजादी के इन दीवानों को कटवाया है। यह कार्य लोगों में जोश भरने के लिए किया था। इसका नतीजा भी जानता था। शाम को गाजीपुर जेल में तत्कालीन जिलाधिकारी अनंत प्रसाद मीसा वारंट लेकर पहुंच गये। उस समय बैरक नम्बर 10 में बंदी साथियों के बीच मैं रामायण पढ़ रहा था। सिपाही के सूचना देते ही साथी फूट-फूटकर रोने लगे। मैंने फिर जोश भरा और कहा कि मैं रहूं या न रहूं, मां के दूध का कर्ज चुकाते रहना। हमारी 22 मार्च 1977 को हुई। 

आंदोलन का चेहरा जेपी और नेपथ्य में थे गोविंदाचार्य और राम बहादुर राय
शंभुनाथ राय ने बताया कि आरएसएस भले आज तक स्वीकार नहीं करता लेकिन इस पूरे आंदोलन की भूमिका संघ ने ही बनाई थी। संघ के ही लोग हर जगह आंदोलन में प्रमुख भूमिका में थे। उस आंदोलन में अन्ना हजारे की तरह जेपी एक चेहरा थे। इसकी पूरी व्यूह रचना तो गोविंदाचार्य और राम बहादुर राय ने बनाई थी। उस समय गाेविंदाचार्य पटना में विद्यार्थी परिषद के विभाग संगठन मंत्री थे। राम बहादुर राय उस समय अखिल भारतीय मंत्री थे और बिहार तथा उड़ीसा का काम देख रहे थे। आंदोलन की योजना बनाना, उस पर अमल की रणनीति, इन्हीं दोनों लोगों के कंधों पर थी।

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