संजीवनी टुडे

सदियों पुरानी जत्ती परंपरा को बचाने का प्रयास कर रहे हैं धर्मेंद्र

संजीवनी टुडे 14-01-2019 17:57:30


मंडी। हिमाचल अपनी प्राचीन देव संस्कृति,लोक परंपराओं व ठेठ रीति, रिवाजों के लिए विश्व भर में ख्याति प्राप्त है। मंडी जिला के उपमंडल करसोग व सुंदरनगर की विलुप्त हो रही प्राचीन परंपराओं को सहेजने का प्रयास करसोग उपमंडल के गांव कुन्नू निवासी धर्मेंद्र कुमार शर्मा कर रहे हैं। धर्मेंद्र करसोग की लुप्त हो रही सदियों पुरानी देवी-देवताओं की गाथाओं का ठेठ गायन, वादन व लोक नृत्य जत्ती परंपरा को बचाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। धर्मेंद्र पिछले डेढ़ वर्ष से केंद्र सरकार के मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर व सीसीआरटी द्वारा चयन के उपरांत लगातार जत्ती परंपरा पर शोध कार्य कर रहे हैं। जत्ती गीतों, लोकवाद्य यंत्रों और पारंपरिक लोकनृत्य की बारिकीयों को सीखकर व जानकार बुजुर्गों से जानकारी प्राप्त कर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के लिए इसका संरक्षण कर रहे हैं। 

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धर्मेंद्र अपने शोध कार्य के साथ-साथ विद्यालयों, महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों आदि में नई पीढ़ी को जत्ती लोक गीतों के साथ-साथ दुर्लभ पशु त्योहार माड़, दैओडी(दिवाली),नैणी, भौंरू, लामण, स्वांग, लोक मंगलमय गीत और पारंपरिक सुकेती लोकनृत्य की शास्त्रीय बारीकियां सिखाने में जुटे हुए हैं। धर्मेंद्र हिमाचल का ताज कहे जाने वाले संगीत सरताज व संगीत उस्ताद डॉ.कृष्ण लाल सहगल के शिष्य हैंऔर उन्हीं की भांति अपनी अमूल्य लोक संस्कृति को सहेजने व संरक्षित करने में प्रयासरत हैं। 


मंडी जिला के करसोग क्षेत्र में मां काली कामाख्या या कामाक्षा और ममेल स्थित देवाधिदेव ममलेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। जत्ती परंपरा का उदभव भी भगवान शिव से ही माना जाता है। क्योंकि जत्ती का गायन, वादन व नृत्य शिव गाथा गाकर शिवरात्रि से 10,15 दिन पूर्व ही शुरू हो जाता है। वहीं करसोग उपमंडल में शिव, विष्णु, मां काली, नाग देवता, मूल मांहूनाग बुखारी, नाग धमुनि कुन्नू, मां चंडी, देव बड़ेयोगी आदि लोक देवताओं के विशेष उत्सवों के दौरान पूजा के रूप में देवी-देवताओं की गाथाओं का छंदबद्ध गान जत्ती कहा जाता है। वेद, पुराण, शास्त्र, नागों और पहाड़ की लोक परंपराओं का बखान भी जत्तीयों में आता है।

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करसोग उपमंडल के कई क्षेत्रों जैसे सोमाकोठी, चौंरीधार, तेबन, चवासी, महोग, चोआ, बलाहणी, स्यांज,बगड़ा,नांज आदि के धार्मिक अनुष्ठानों में भी जत्ती गायन द्वारा पूजा की जाती है। करसोग के गांवों,कस्बों,परगनों आदि पर्वतीय क्षेत्रों में देवताओं का स्तुति गान मुख्य त्योहारों के समय जत्ती के रूप में किया जाता है। इधर, लोक संस्कृति संरक्षक धर्मेंद्र कुमार शर्मा का कहना है कि करसोग क्षेत्र के साथ,साथ संपूर्ण हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों की सदियों पुरानी लोक विधाएं,गाथाएं व ठेठ लोक नृत्य विलुप्त होते जा रहे हैं। यदि आज की पीढिय़ां अपनी सभ्यता और संस्कृति को नहीं जानेंगी तो वह आगे वाली पीढिय़ों को अपनी संस्कृति के बारे में क्या बताएंगे। प्राचीन परंपराओं और लोक संस्कृति का संरक्षण बेहद जरूरी है।
 

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