संजीवनी टुडे

देवरिया लोकसभा क्षेत्र: सपा-बसपा में गठबंधन के बाद मुकाबला हुआ रोचक

संजीवनी टुडे 23-03-2019 12:56:49


गोरखपुर/देवरिया। 2019 के लोक सभा चुनाव में देवरिया संसदीय सीट भाजपा के लिए बेहद अहम है क्योंकि यह संसदीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह मंडल का क्षेत्र है। पिछले चुनाव में बीजेपी को शानदार जीत मिली थी।

 2019 के लोकसभा चुनाव में सत्ता में फिर से लौटने के लिए बीजेपी को यह सीट हर हाल में जीतनी होगी, लेकिन आम चुनाव से पहले सपा-बसपा के बीच चुनावी गठबंधन के बाद मुकाबला रोचक हो गया है। 

जनपद देवरिया संत विनोबा व बाबा राघव दास की कर्म स्थली के साथ-साथ महान संत देवरहवा बाबा की तपोस्थली रही है। इस जनपद का देवरिया लोक सभा क्षेत्र उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों में एक है। देवरिया जिला उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में स्थित है। 

गोरखपुर के पूर्व-दक्षिण के कुछ हिस्से को अलग करके 16 मार्च 1946 को यह जनपद के रूप में अस्तित्व में आया। देवरिया लोक सभा का इतिहास काफी पुराना है। यहां से पहली बार 1952 में विश्वनाथ राय ने कांग्रेस से चुनाव जीत कर जिले के इतिहास में पहले सांसद के रूप में अपना नाम दर्ज करवा लिया।

 वर्ष 1989-90 तक इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा। मगर उस दौर में भी 1957 के लोक सभा चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रामजी वर्मा ने कांग्रेस के विश्वनाथ राय को चुनाव हराया था। 1962 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के विश्वनाथ राय ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी अशोका रनजीत्रम मेहता को 19241 मतों के अन्तर से हराकर पुनः शानदार वापसी की। वह इसके बाद लगातार 15 वर्षों तक सांसद रहे। 

1977 में हुए 6वीं लोकसभा के चुनाव में जनता के बीच कांग्रेस का विरोध चरम पर था। इस चुनाव में भारतीय लोक दल के उग्रसेन को 258864 वोट के रूप में जनसमर्थन मिला। कांग्रेस के विश्वनाथ राय को महज 76691 मत पाकर संतोष करना पड़ा। इस चुनाव में उग्रसेन ने 182173 वोट से विश्वनाथ को हराया था। मात्र 240000/- में टोंक रोड जयपुर में प्लॉट 9314166166

इसके बाद कांग्रेस ने 1980 के चुनाव में रमायन राय पर दांव लगाया। इस कांग्रेसी नेता ने जनता पार्टी के रामधारी शास्त्री को हराकर एक बार फिर इस सीट को कांग्रेस की झोली में डाल दिया। 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने फिर अपना प्रत्याशी बदला। इस चुनावी दंगल में कांग्रेस ने देवरिया डिस्ट्रिक बोर्ड के पूर्व चेयरमैन राजमंगल पाण्डेय को उतारा। वह ब्राम्हणों के बड़े नेता माने जाते थे। उन्होंने रामधारी शास्त्री को हराया। इसके बाद से अब तक लगातार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ रहा है। 

1889 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर प्रत्याशी बदल कर चुनाव लड़ा। इस बार चुनावी जंग में कांग्रेस ने शशी शर्मा पर दांव लगाया लेकिन यह दांव सफल नहीं रहा। कांग्रेस के अपने ही पुराने नेता राजमंगल पाण्डेय ने जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए शशी शर्मा को चुनावी शिकस्त दी।

 कांग्रेस को यह ऐसी शिकस्त मिली कि 1991 से लेकर 2014 तक के होने वाले लोक सभा चुनाव में हार तो दूर तीसरे व चौथे पायदान पर ही संतोष करना पड़ा। 1991 में इस सीट पर जनता दल ने बाबू मोहन सिंह पर दांव लगाया। मोहन सिंह भाजपा प्रत्याशी गोविन्द प्रसाद राय को 17177 वोटों से चुनाव हराकर पहली बार सांसद बने। 

1996 लोस चुनाव: सबसे पहले प्रकाश ने खिलाया कमल देवरिया लोक सभा सीट पर सबसे पहले कमल खिलाने वाले सांसद थल सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मणि त्रिपाठी हैं। वर्ष 1996 के लोक सभा चुनाव में भाजपा ने त्रिपाठी पर दांव लगाया। 

भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे श्री त्रिपाठी ने जनता दल के नन्द किशोर सिंह को चुनावी शिकस्त दी। इसके साथ ही 1996 के चुनाव में भाजपा लोक सभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 1998 में मध्यावधि चुनाव हुआ। इस समय तक बाबू मोहन सिंह समाजवादी पार्टी में आ गये थे। देवरिया लोक सभा सीट से सपा ने मोहन सिंह पर दांव लगाया।

 भाजपा ने एक बार फिर प्रकाश मणि त्रिपाठी पर विश्वास किया। यह चुनाव काफी रोचक रहा। दोनों प्रत्याशी पूर्व में एक-एक बार सांसद रह चुके थे। मगर इस चुनाव में श्री त्रिपाठी को कामयाबी नहीं मिली। सपा के मोहन सिंह ने महज 4068 मतों से भाजपा प्रत्याशी को चुनावी शिकस्त दी। 

चन्द दिनों बाद 1999 में फिर लोक सभा चुनाव का बिगुल बजा। भाजपा और सपा ने अपने-अपने पुराने चेहरों पर ही दांव लगाया। इस बार फिर चुनावी रण में दोनों दिग्गज नेताओं ने अपनी-अपनी तरफ से हुंकार भरी। इस बार के चुनाव में प्रकाश मणि ने बाबू मोहन सिंह को 42141 मतों के अन्तर से चुनाव हराकर कमल खिलाया। इस जीत के साथ देश में पहली बार भाजपा की सरकार बनी।

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 स्व. अटल विहारी बाजपेयी प्रधान मंत्री बने। 2004 के लोक सभा चुनाव में भाजपा व सपा ने एक बार फिर अपने-अपने पुराने चेहरों पर भरोसा जताया। इस चुनाव में बाबू मोहन सिंह ने प्रकाश मणि त्रिपाठी को 52226 मतों के अन्तर से चुनाव हरा दिया।

2009 में जब चुनावी रण सजकर तैयार हुआ तो एक बार फिर भाजपा से प्रकाश मणि त्रिपाठी व सपा से मोहन सिंह चुनावी अखाड़े में उतरे। इस चुनाव का परिणाम बेहद अलग था। इस चुनाव में बाबू मोहन सिंह व प्रकाश मणि दोनों को हार का सामना करना पड़ा। जीत का सेहरा बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे गोरख प्रसाद जायसवाल के सिर पर सजा। 

बसपा के गोरख प्रसाद जायसवाल से भाजपा प्रत्याशी प्रकाश मणि को 41779 मतों के अन्तर से हार का सामना करना पड़ा। इसी जीत के साथ देवरिया लोक सभा पर बसपा का खाता खुला। बाबू मोहन सिंह तीसरे नम्बर पर रहे। पांच साल सांसद रहने के साथ ही गोरख प्रसाद जायसवाल ने राजनीति से संन्यास ले लिया। 
2014 के लोक सभा संग्राम में भाजपा ने स्थानीय चेहरों पर विश्वास करने से परहेज किया। पार्टी शीर्ष नेत

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