संजीवनी टुडे

समाज को एक सूत्र में पिरोने का आस्था का महापर्व है छठ

संजीवनी टुडे 10-11-2018 16:42:00


पटना। लोक आस्था और आत्म संयम का चार दिनों तक चलने वाला छठ केवल एक पर्व ही नहीं बल्कि आस्था को पर्यावरण ,प्रकृति और जीवन दर्शन से जोड़ने तथा जातीयता की सारी हदें तोड़ समाज को एक सूत्र में पिरोने का महापर्व है। 

रविवार से प्रारम्भ होकर बुधवार 14 नवम्बर तक चलने वाले इस इस पर्व में देवी देवताओं की नहीं बल्कि संसार को चलाने वाले प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण अवयव सूर्य को श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है 1 आज के सुपर वैज्ञानिक युग में सूर्य को विज्ञान की धुरी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा क्योंकि जीव विज्ञान से लेकर अन्तरिक्ष विज्ञान तक इसमें समाहित है। सूर्य की किरणों के बिना स्वस्थ जीवन की परिकल्पना असंभव है और यह पर्व सूर्य के इसी पहलु को स्मरण करता है। 

व्रत करने वाले का महत्त्व ऐसा कि ब्राह्मणवाद-दलितवाद के सारे मिथक टूट जाते हैं और सभी एक साथ जल में खड़े हो कर भगवान भास्कर को अर्घ्य देते हैं। एक ब्राह्मण भी दलित छठ व्रती के चरण को पूरी श्रद्धा से छू कर इस पर्व में आशीर्वाद लेता है और भूलवश पैर लग जाने पर उनके चरण स्पर्श कर क्षमा प्रार्थना भी करता है। 

करोड़ों लोगों के एक साथ मिल कर अस्त और उदय होते सूर्य की उपासना जीवन के दर्शन को प्रतिबिंबित करता है। अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देना उम्मीद और आशा का दामन भी थामना सिखाता है। चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली हो अवसान अवश्यम्भावी है। उगते हुए सूर्य को नमन यह भी बताता है कि हमें धैर्यपूर्वक समय का इंतज़ार करना चाहिए क्योंकि जिसका अंत हुआ है उसका उदय भो होगा। 

यह पर्व केवल बिहार ही नहीं अपितु पूरे भारत में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है और अब तो विदेशों में बसे भारतीयों ने अन्य देशों में भी इसे प्रचारित कर दिया है। 

चीन और मिश्र में पुरातन काल में सूर्य मन्दिर का होना यह दर्शाता है कि भगवान भास्कर का महत्त्व पूरे विश्व में था। चीन के बीजींग में वहां की मिंग शासन के रजा जियाजिंग ने 1530 ई. में सूर्य मंदिर बनवाया था जहाँ सूर्य की उपासना उपवास रख कर होती थी। 

मिश्र के इतिहास को देखा जाये तो वहां अनेक सूर्य मंदिर के होने का ज़िक्र मिलता है जिसमें प्रमुख रूप से अबू सिमबेल, उसेकार्फ और निउसेरे शामिल हैं। मेक्सिको, जापान से लेकर यूनाइटेड स्टेट्स के कोलाराडो में मेसा वेर्दे नेशनल पार्क और प्राचीन माया सभ्यता में भी सूर्य मंदिर होने के संकेत मिले हैं। 

भारत में बिहार छठ महापर्व के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध_ है। यहाँ औरंगाबाद जिले के देव स्थित सूर्य मंदिर और नालंदा जिले के बड़गांव में स्थित सूर्य मंदिर में दूर दूर से लोग आ कर इस अवसर पर सूर्य की पूजा अर्चना करते हैं। मन्नतें पूरी होने पर इन दोनों जगहों पर लोग विशेष रूप से छठ करने आते हैं। 

छठ व्रत के संदर्भ में एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। 

एक अन्य कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा ने अपनी पत्नी के साथ कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की जिसके फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा। नालंदा के बड़गांव में छठ पर्व की परम्परा वैदिक काल से चली आ रही है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र राजा शाम्ब को बड़गांव में ही पूजा अर्चना करने पर कुष्ठ रोग से मुक्ति मिली थी। 

देवता के रूप में पूजे जाने वाले सौर मंडल का एक प्रमुख ग्रह सूर्य उत्तर वैदिक काल के अंतिम कालखंड में मानवीय रूप में परिकल्पित थे जो कालांतर में सूर्य की मूर्ति रूप में स्थापित हो गए। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया और अनेक स्थानों पर सूर्य देव के मंदिर भी बनाए गए। 

पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पाई गई। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ हो गया था जो विशेष सूर्योपासना से ठीक हुआ। 

छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया था। 

एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की थी और प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे। सम्भवतः छठ में अर्घ्य दान की यह प्रथा वहीँ से शुरू हो कर आज भी चलती आ रही है।छठ पर्व से जुड़े उल्लेख पुराणों में भी मिलते हैं। 

चार दिनों तक चलने वाले इस व्रत का प्रारंभ कार्तिक मास की चतुर्थी तिथि को नहाए खाए से हो जाता है। पंचमी से खरना व्रती का 36 घंटों का उपवास प्रारंभ होता है। इस पर्व में सूर्य षष्ठी को अस्ताचलगामी सूर्य की नदी के जल में खड़े होकर आराधना की जाती है और दूसरे दिन सप्तमी को पुनः नदी के जल में खड़े रह कर उगते सूर्य को अर्घ्य देकर उनकी वंदना के बाद व्रती उपवास तोड़ते हैं। 

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इस पर्व में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है और घाटों तथा सड़कों की साफ़ सफाई लोग आपस में मिलजुल कर करते हैं। भगवान सूर्य एक मात्र प्रत्यक्ष देवता हैं जिनकी रोशनी से ही प्रकृति में जीवन चक्र चलता है। इनकी किरणों से ही धरती में प्राण का संचार होता है और फल, फूल, अनाज, अंड और शुक्र का निर्माण होता है। यही वर्षा का आकर्षण करते हैं और ऋतु चक्र को भी चलाते हैं। भगवान सूर्य की इस अपार कृपा के लिए छठ पर्व के दौरान श्रद्धा पूर्वक समर्पण और पूजा उनके प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है। 

 

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