संजीवनी टुडे

नाले के रूप में तब्दील हो चुकी है यमुना, आज विलुप्त की कगार पर

संजीवनी टुडे 17-07-2019 11:52:29

यम की बहन यमुना आज विलुप्त की कगार पर है।


लखनऊ। यम की बहन यमुना आज विलुप्त की कगार पर है। उसको दिल्ली में देखकर यही कहा जा सकता है कि ‘नदी नहीं नाला है, फलदायिनी का पानी काला है।’मोक्षदायिनी गंगा (गंगा में स्नान का फल दूसरे जन्म में मिलता है। इस कारण उसे मोक्षदायिनी कहा गया है।) में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर आवाज उठती रही है लेकिन अपने जल में स्नान करने वालों को इसी जन्म में फल देने वाली यमुना स्वयं बीमार पड़ी हैं। वे कुशलक्षेम पूछने वालों का इंतजार कर रही हैं।

 नदी पर काम करने वाले पर्यावरणविदों का मानना है कि गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी यमुना का जल जब तक साफ नहीं होगा, तब तक गंगा के जल की स्वच्छता का कल्पना करना दिवास्वप्न है।

इस संबंध में 2010 में यमुना यात्रा कर चुके समाजसेवी चंद्रभूषण पांडेय ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि दिल्ली की जनसंख्या तीन करोड़ है। यदि 100 लीटर सीवेज पानी प्रति व्यक्ति के हिसाब से तीन अरब लीटर से ऊपर प्रतिदिन सीवेज का पानी यमुना में जाता है। ट्रीटमेंट प्लांटों का शहरों में क्या स्थिति है, यह किसी से छिपा नहीं है।

नदी से चौड़ा है नोयडा सेक्टर 18 का नाला
उन्होंने नोयडा के सेक्टर 18 के नाले का जिक्र करते हुए हिन्दुस्थान समाचार से कहा कि वह नाला यमुना से चौड़ा है। उसे देखकर नहीं कहा जा सकता है कि यह नाला है, जबकि वहां बिना नाक बंद किये नहीं चला जा सकता है। सरकार चाहे जो भी हो, सभी ने इसकी सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये तो व्यय कर दिये लेकिन इस संबंध में कार्य का परिणाम शून्य ही रहा।

अस्तित्व समाप्त होने का खतरा
यमुना व उसकी सहायक नदियों पर कार्य करने वाले व बुंदेलखंड में जल पुरूष के नाम से विख्यात संजय सिंह ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि यमुना आज खुद अपने भक्तों के दिये पीड़ा से प्रताड़ित है। यदि यमुना के प्रति थोड़ी भी भक्ति बची हो तो उन भक्तों को आगे आना चाहिए। इसके प्रति समाज में जागरूकता की भी जरूरत है, क्योंकि आज तो यमुना नालों के कारण जिंदा है लेकिन आने वाले समय में उसका अस्तित्व ही खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है।

यमुना नदी नहीं नाले की है कहानी
जल-पुरुष के नाम से प्रसिद्ध रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने हिन्दुस्थान समाचार से बताया कि अब यमुना नदी नहीं, एक नाले की कहानी रह गयी है। जब दिल्ली में 22 किलोमीटर के सफर में ही 18 से अधिक नाले मिल जाते हैं। इस नदी के जल को पीना तो दूर स्नान भी करना बीमारी को दावत देना है। ऐसे में जरूरत है कि उसमें सांस डाला जाय। इसको प्रदूषण करने में सबसे बड़ा योगदान औद्योगिक इकाइयों का है। उनके प्रदूषित जल को नदी में जाने से सख्ती के साथ रोकना चाहिए।

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