संजीवनी टुडे

निर्जला एकादशी पर श्रद्धालुओं ने गंगा में लगाई आस्था की डुबकी, निकली कलश यात्रा

संजीवनी टुडे 13-06-2019 15:21:34

ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (निर्जला एकादशी) पर बृहस्पतिवार को हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा नदी में आस्था की डुबकी लगाई। दान पुण्य के बाद काशी पुराधिपति बाबा विश्वनाथ के दरबार में श्रद्धालुओं ने पावन ज्योर्तिलिंग पर जलाभिषेक भी किया।


वाराणसी। ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (निर्जला एकादशी) पर बृहस्पतिवार को हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा नदी में आस्था की डुबकी लगाई।  दान पुण्य के बाद काशी पुराधिपति बाबा विश्वनाथ के दरबार में श्रद्धालुओं ने पावन ज्योर्तिलिंग पर जलाभिषेक भी किया। 

एकादशी पर गंगा स्नान के लिए श्रद्धालु बुधवार शाम से ही गंगा घाटों पर पहुंचने लगे। पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से आये श्रद्धालु पूरी रात घाट की सीढ़ियां पर गुजार श्रीहरि की आराधना करते रहे। पूरी रात गंगा तट गीतों व भजनों से गुलजार रहा। भोर से ही स्नान दान का क्रम शुरू हुआ। तमाम श्रद्धालुओं ने घाट पर ही बाटी-चोखा समेत विभिन्न पकवान बनाए। 

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पुरोहितों को भोजन कराकर उन्हें साम‌र्थ्य अनुसार वस्त्र, छाता, स्वर्ण, जलपूरित कलश, चीनी आदि दान किया। उधर, निर्जला एकादशी पर ही परम्परानुसार सुप्रभातम संस्था ने वार्षिक श्री काशी विश्वनाथ वार्षिक कलश यात्रा गंगा तट से बाबा दरबार तक ​निकाली। कलश यात्रा का समापन काशी विश्वनाथ का 1008 कलश जल से अभिषेक से हुआ।

इसके पूर्व संस्था के कार्यकर्ता व पदाधिकारी और गणमान्य नागरिक राजेन्द्र प्रसाद घाट पर सुबह जुटे। यहां गंगा स्नान के बाद गौरी-गणेश व गंगा पूजन किया। पूजा में 108 कलश लिए केदारघाट से भक्तों का जत्था भी शामिल हुआ। इसके बाद 1008 कलशों में गंगा जल भर यात्रा प्रारम्भ हुई। कलश यात्रा के आगे बढ़ते ही पूरा क्षेत्र हर-हर महादेव, शंख ध्वनि, डमरुओं व अन्य वाद्ययंत्रों की थाप से गूंज उठा। कलश यात्रा में शामिल श्रद्धालु सिर पर कलश रख धर्म पताका लहराते बाबा दरबार की ओर बढ़ने लगे। मार्ग में 21 युवाओं ने शंख ध्वनि तो 40 सदस्यीय डमरु दल ने माहौल अध्यात्मिक और शिवमय बना दिया। 

कलश यात्रा में हिम शिवलिंग, यात्रा के शिल्पकार स्व. राजकिशोर गुप्ता का चित्र सहित मनमोहक झांकिया अलग छटा बिखेर रही थी। यात्रा दशाश्वमेध, गौदौलिया, बांसफाटक, ज्ञानवापी गेट नम्बर चार होते हुए श्री काशी विश्वनाथ दरबार तक पहुंची। यहां राष्ट्र और समाज के कल्याण के लिए देवाधिदेव महादेव को गंगा-गोमती और प्रयाग संगम का जल के साथ पावन ज्योर्तिलिंग पर दूध अर्पित किया गया। 

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