संजीवनी टुडे

हमारी संस्कृति में सारी व्यवस्था कर्म पर आधारित-प्रो.विश्वकर्मा

संजीवनी टुडे 06-12-2018 18:24:30


डेस्क। विश्व की प्राचीनतम संस्कृति भारतीय भू-भाग में है। पूरे विश्व में भारत ही कर्मभूमि है, शेष भूमि भोग भूमि है। हमारी संस्कृति में सारी व्यवस्था कर्म पर आधारित है। पूरे विश्व में भारत जैसा अनुपम एवं विलक्षण देश नहीं है।

उक्त विचार मुख्य अतिथि प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा, अध्यक्ष, उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग प्रयागराज ने गुरुवार को उ.प्र राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र में व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की चर्चा 1947 से पूर्व की होनी चाहिये। भारतीय संस्कृति का अनुभव करने के लिए भारतीय साहित्य को भी अवश्य देखना होगा। विश्व का इतिहास पुराणों में ही समाहित है और वेदों में ब्रह्माण्ड की शक्ति को पहचानने और मनन करने के सूत्र हैं। पुराणों में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भारत के ज्ञान, कला, इतिहास और साहित्य का गहन अध्ययन किया है, फिर एक ऐसी स्थिति आई कि भारत को इण्डिया कहा जाने लगा। 

प्रो. विश्वकर्मा ने कहा कि भारत की संस्कृति को देखना है तो हमें औपनिवेशिक दृष्टि से न देखकर उसे भारतीय दृष्टि से देखना होगा। वर्तमान में विश्व फलक पर भारत का एक नया परिपेक्ष्य साामने है, जिसका अनुभव पूरी दुनिया कर रही है। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति की विशेषता यही है कि हम अपना परिष्कार स्वयं कर लेते हैं। प्रायश्चित, क्षमा, दान, सहिष्णुता आदि द्वारा हम अपना परिष्कार स्वयं करके भारतीय संस्कृति की मिसाल पेश करते है। विश्व कल्याण हमारी संस्कृति का उद्देश्य है और हमारी संस्कृति विश्व के आलोक के लिए है।विकास को लेकर पूरा विश्व चिंतित-कुलपति कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति को जानने समझने के लिये हर विषय को अपनी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं। इनका उपयोग आवश्यकता के अनुसार होगा, तभी यह लम्बे समय तक चल सकते हैं। उन्होंने कहा कि केवल टेक्नालॉजी से संसाधनों का विकास करने की बात भ्रमपूर्ण है। संसाधनों का विवेक संगत, तर्कसंगत आवश्यकतानुसार उपयोग होगा तभी संतुलन कायम रहेगा। 

कुलपति ने कहा कि आज विकास को लेकर पूरा विश्व चिंतित है। पर्यावरण संतुलन तथा शान्ति सुरक्षा बनाये रखने के लिये विश्व भर में प्रयास किये जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया को पांच मंत्र दिये हैं जिससे दुनिया का कल्याण संभव है। ये पांच मंत्र त्याग के साथ उपयोग, वसुधैव कुटुम्बकम, एकम् सदविप्रा बहुधा वदन्ति, ईश्वर सर्वभूतानां तथा बहुजन हिताय बहुजन सुखाय हैं।

अतिथियों का स्वागत प्रो.सुधांशु त्रिपाठी ने किया। संगोष्ठी के बारे में आयोजन सचिव सुनील कुमार तथा विश्वविद्यालय के बारे में संयोजक डा. एस.कुमार ने जानकारी दी। संचालन रमेश चन्द्र यादव तथा धन्यवाद ज्ञापन कुलसचिव डा.अरूण कुमार गुप्ता ने किया। मुख्य अतिथि प्रो.विश्वकर्मा तथा कुलपति प्रो. सिंह ने इस अवसर पर ई-सोविनियर तथा संगोष्ठी की पुस्तिका का विमोचन किया। 

जयपुर में प्लॉट/ फार्म हाउस: 21000 डाउन पेमेन्ट शेष राशि 18 माह की आसान किस्तों में, मात्र 2.30 लाख Call:09314166166
MUST WATCH & SUBSCRIBE

इस अवसर पर इविवि के प्रो.हेरम्ब चतुर्वेदी, प्रो. ओमप्रकाश श्रीवास्तव, जेएनयू के डा.अनिल सिंह, प्रो. आरपीएस यादव, प्रो.सुधांशु त्रिपाठी तथा डा. एस.कुमार आदि ने विचार व्यक्त किये। राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश भर से 80 प्रतिभागियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किये। 

sanjeevni app

More From state

Loading...
Trending Now