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यहां पर में मौजूद हैं 'जिंदा हनुमान', कई सैकड़ों साल से कोई भी श्रद्धालु नहीं भर पाया इस मूर्ति का मुख

संजीवनी टुडे 17-02-2020 04:01:00

पवनपुत्र यानि महावीर बंजरगबली की माया से हर कोई युगों—युगों से वाकिफ है उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के घने बीहड़ो में भी हनुमान जी का चमत्कार जारी है जिसे देखने और उसका लाभ लेने के लिये लाखों लोग श्रद्धाभाव से बेखौफ होकर जाते हैं।


इटावा। पवनपुत्र यानि महावीर बंजरगबली की माया से हर कोई युगों—युगों से वाकिफ है उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के घने बीहड़ो में भी हनुमान जी का चमत्कार जारी है जिसे देखने और उसका लाभ लेने के लिये लाखों लोग श्रद्धाभाव से बेखौफ होकर जाते हैं। इस हनुमान मूर्ति के चमत्कार का आलम है कि कई सैकड़ों साल से कोई भी श्रद्धालु इस मूर्ति का मुख भरने का साहस नहीं कर पाया है। 

महाभारत कालीन सभ्यता इटावा में स्थापित इस मंदिर में कई राज्यों के हनुमान भक्त अपनी आस्था के चलते पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं। 

राजा हार गया 

इस मूर्ति के उद्गम के बारे में कहा जाता है कि प्रतापनेर के राजा हुक्म तेजप्रताप सिंह को ऐसा सपना आया जिसमें इस मूर्ति के इसी स्थान पर निकले होने की बात बताई गई, फिर राजा ने इस मूर्ति को अपने महल में काबिज करने की कोशिश की लेकिन राजा हार गया और हनुमान जी की मूर्ति आज अपने स्वरूप में हनुमान भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। 

हनुमान जी की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित नहीं

  यह चमत्कारिक मंदिर चौहान वंश के अंतिम राजा हुक्म देव प्रताप की रियासत में बनाया गया था। यहां पर महाबली हनुमान जी की प्रतिमा लेटी हुई है और लोगों की मानें तो ये मूर्ति सांस भी लेती है और भक्तों के प्रसाद भी खाती है। यहां की सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर में महाबली हनुमान जी की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित नहीं है। 

हनुमान जी जीवित रूप में विराजमान

कहा जाता है यहां हनुमान जी खुद जीवित रूप में विराजमान हैं। बीहड़ में बसे पिलुआ महावीर का मन्दिर लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। अगर इसे ऐतिहासिक नज़रिये से भी देखा जाए तो ये काफी अहम है। 

पूंछ नहीं हटा पाया भीम

कहा जाता है कि महाभारत काल के दौरान कुन्ती पुत्र भीम यमुना नदी के पास से निकल रहे थे तभी वहां अचानक उनके रास्ते में आराम कर रहे हनुमान की पूंछ आ गई। जिसे हटाने का भीम ने खूब प्रयास किया, लेकिन अपने बाहुबल के नशे में चूर भीम नाकाम रहे। पूंछ हटाने में पस्त भीम को जब हनुमान जी की हकीकत का पता चला तो वो नतमस्तक हो गये और फिर उन्होंने शुरू की अपने बड़े भाई हनुमान की सेवा। तब जाकर भीम से खुश होकर हनुमान जी ने उन्हें एक वरदान दिया,जिसकी वजह से राजसूर्य यज्ञ में जरासंध को मारने में भीम को कामयाबी मिली। 

डाकुओं ने उत्पात मचाने की हिम्मत नहीं की

पिलुआ मन्दिर की ऊंची-ऊंची दीवारें पवन पुत्र के प्रति लोगों की आस्था की कहानी बयां करती है। इस मन्दिर में जो भी अपनी मुराद लेकर आता है बजरंग बली के दर से खाली नहीं लौटता। यही वजह है कि यहां हर मंगलवार को श्रद्धालुओं का मेला लगा रहता है। इस मन्दिर की खास बात ये है कि डाकुओं ने यहां कभी उत्पात मचाने की हिम्मत नहीं की। जिसकी वजह से यहां आने में श्रद्धालुओं के पैर कभी नहीं कांपे। उनका मानना है कि श्रद्धालुओं के साथ कुछ ग़लत करने वालों को गदाधारी, महाबली हनुमान जी ही सजा दे देते हैं। 

हिन्दुस्थान में दक्षिणमुखी लेटी हुई हनुमान की मूर्ति इटावा के अतिरिक्त सिर्फ इलाहाबाद में है। इस मंदिर में स्थापित मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि आज तक कोई इस मूर्ति का उदर नहीं भर सका है परंतु यदि आस्था सच्ची हो तो एक लोटा दूध से ही दूध बाहर झलक आता है, इटावा मुख्यालय से तकरीबन दस किमी दूर यमुना नदी से सटे बीहड़ों में निर्जन स्थान पर एक टीले पर मंदिर स्थित होने के बावजूद यहां भक्ति का सैलाव उमड़ता है।

भक्तों के चढ़ाये प्रसाद से मुखार बिन्दु भरा नहीं

  पिलुअन महावीर मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं में बहुत आस्था है। श्रद्धालु इस मंदिर में अपनी तमाम मन्नत लेकर आते हैं और मान्यता है कि सच्चे दिल से मांगी गई हर मन्नत बजरंगबली पूरी करते हैं। पिलुआ महावीर मंदिर में स्थित हनुमानजी की इस मूर्ति की विषेशता यह है कि मूर्ति के मुखार बिंदु में जो भी जल,दूध, लड्डू प्रसाद आदि डाला जाता है वह सीधा मूर्ति के उदर में चला जाता है। आज तक इस मूर्ति के मुखार बिंदु में हजारों टन प्रसाद श्रद्धालुओं ने चढ़ाया है परंतु मूर्ति का मुखार बिंदु भरा नहीं जा सका। 

वैज्ञानिकों के लिए भी रहस्य

आज के वैज्ञानिक युग में भी इसका शोध किया गया, परंतु यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि इसमें कौन सी तकनीक है जो प्रसाद, दूध, जल का कहीं निकलना नहीं होता है। वह कहां चला जाता है वैज्ञानिकों के लिए भी रहस्य बना हुआ है। मंदिर में स्थापित मूर्ति हनुमान की बालरूप की विभूषित प्रतीत होती है। 

  पुरातत्वविदों के लिए उसका मूर्ति शिल्प आज भी शोध का विषय है। लेकिन इसके बावजूद भी आज तक पुरातत्वविदों ने इस रहस्य को जानने का प्रयास नहीं किया कि आखिर उस दौर में इस मूर्ति को बनाने में किस तकनीक का प्रयोग किया गया है। 

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