संजीवनी टुडे

माघी त्यौहार मनाने की गिरिपार क्षेत्र में अनूठी परंपरा

संजीवनी टुडे 12-01-2019 14:34:06


नाहन। मकर सक्रांति का त्यौहार जहां पूरे देश में सूर्यदेव की अराधना तथा लोहडी का पर्व अग्निदेव कीे तिल एवं गुड से पूजा के साथ मनाया जाता है वहीं पर सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली के उपरान्त माघी त्यौहार का पर्व बडे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कालान्तर से गिरि पार क्षेत्र में माघी त्यौहार पर बलि प्रथा का विधान है जोकि वर्तमान में भी कायम है परन्तु मंहगाई के इस दौर में अब काफी लोग बलि प्रथा को तिलांजलि देने लग गए है और माघी त्यौहार को लोगों ने पारंपरिक व्यंजनों के साथ मनाना आरंभ कर दिया है। 

माघी पर्व लोग अपने आराध्य पीठासीन देवता की पारंपरिक ढंग से पूजा अर्चना भी करते हैं। विशेषकर जिला सिरमौर में चार बड़ी साजी अर्थात सक्रांति पर देव पूजा की परम्परा प्रचलित है। जिसमें वीशू अर्थात वैशाख सक्रांति, हरियाली, दिवाली और माघी अर्थात मकर सक्रांति शामिल है। लोगों की आस्था है कि इन चार बड़ी साजी पर पीठासीन देवता की पूजा से देवी देवता प्रसन्न होते है और क्षेत्र में समृद्धि एवं खुशहाली का सूत्रपात होता है। 

माघी पर्व पर लोग अपने सगे संबंधियों खासकर बेटीयों को आमंत्रित करके कई दिन तक त्यौहार का पूर्ण आनन्द लिया जाता है। गिरिपार क्षेत्र की 125 पंचायतों में लगभग 44हजार परिवार रहते है और इस क्षेत्र के साथ लगते उत्तराखण्ड के जौनसार-बाबरक्षेत्र में भी माघी त्यौहार को पांरम्परिक तरह के साथ मनाने की प्रथा प्रचलित हेै। 

माघी त्यौजश्न गिरिपार क्षेत्र में लगभग एक सप्ताह तक मनाया जाता है। इस वर्ष भी यह त्यौहार 12 जनवरी से आरंभ हो गया है जिसमें विभिन्न गांव में अलग-अलग तिथियों में यह त्यौहार मनाया जा रहा है। विशेषकर सर्दियों को मध्यनजर रखते हुए लोग पारंपरिक व्यंजन भी बनाते है और जबकि सिरमौर के अन्य क्षेत्रों मे मकर सक्रांति का त्यौहार खिचडी बनाने एवं दान करने के साथ मनाया जाता है। जिला के उपरी क्षेत्रों को सक्रांति के दिन लोग अपने अराध्यदेव के मंदिर में जाकर पारंपरिक पूजा करते है ताकि वर्ष के दौरान क्षेत्र व परिवार में सुख समृद्धि बनी रहे।

जिला के कई क्षेत्रों में लोहडी की रात को अलाव जलाकर तिल एवं रेवडियो के साथ अग्नि पूजा करने का विधान है। लोग अग्निदेव की पूजा के साथ-साथ रात्री को नाच-गाकर लोहडी को मनाते है। शास्त्रों के अनुसार मकर सक्रांति के दिन सूर्य भगवान की गति उतरायण की तरफ हो जाती है और दिन बढ़ने लगते है और रातें छोटी होने लग जाती है।

लोहडी की कथा दुल्ला भटटी के साथ भी जुडी है, जो कि एक वीर योद्धा थे जिसने मुगलों के जुल्मों के खिलाफ कदम बढाया था और एक गरीब ब्राहमण की दो बेटियों की शादी दुल्ला भटटी द्वारा जंगल में अलाव जलाकर करवाई गई थी और इसी परंपरा के अनुसार बच्चे सुंदरिए-,मुदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भटटी वाला हो, दुल्ल धी ब्याही हो, सेर शक्कर पाई हो्य नामक लोहडी गीत गाकर पैसे मांगते है।

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