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आज हैं निर्जला एकादशी, सबसे कठिन व्रत, जानिए पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

संजीवनी टुडे 02-06-2020 07:51:34

आज निर्जला एकादशी व्रत रखा जाएगा। ज्येष्ठ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को अपर और निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति सच्ची श्रद्धा के साथ यह व्रत करता है उसे समस्त एकादशी व्रत से मिलने वाले पुण्यफल के समान ही फल मिलता है।


डेस्क। आज निर्जला एकादशी व्रत रखा जाएगा। ज्येष्ठ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को अपर और निर्जला एकादशी, भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति सच्ची श्रद्धा के साथ यह व्रत करता है उसे समस्त एकादशी व्रत से मिलने वाले पुण्यफल के समान ही फल मिलता है। इस एकादशी व्रत में पानी पीना वर्जित माना जाता है इसलिए इस एकादशी को निर्जला कहते है। इस व्रत को करने से व्यक्ति को समस्त प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। उसके सभी प्रकार के पाप धुल जाते हैं। 

Nirjala Ekadashi

यह व्रत निर्जल रखा जाता है यानि व्रती को बिना पानी का सेवन किए रहना होता है। ज्येष्ठ माह में बिना पानी के रहना बहुत बड़ी बात होती है। इस कारण यह व्रत काफी कठिन माना जाता है। यह व्रत एकादशी तिथि के दिन सूर्योदय से लेकर द्वादशी के दिन व्रत पारण मुहूर्त तक रखा जाता है। 

निर्जला एकादशी 2020 मुहूर्त:

02 जून को ये व्रत रखा जायेगा।

एकादशी तिथि का प्रारंभ दोपहर 02:57 बजे (1 जून) से होगा और इसकी समाप्ति दोपहर 12:04 बजे (2 जून) पर होगी। व्रत पारण का समय 3 जून को प्रात: 05:11 बजे से सुबह 08:53 बजे तक होगा।

Nirjala Ekadashi

आइए जानते हैं निर्जला एकादशी की व्रत विधि।

निर्जला एकादशी का व्रत एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि की रात्रि से ही आरम्भ हो जाता है और रात्रि में अन्न का सेवन नहीं किया जाता है। इस दिन व्रत में प्रयोग होने वाली सामग्री को एकत्रित कर लें। इसके बाद दशमी तिथि की शाम को सात्विक भोजन करके सो जाएं।

एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और शौचादि से निवृत्त होकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर में साफ-सफाई करें। भगवान विष्णु जी की प्रतिमा को गंगा जल से नहलाएं। अब दीपक जलाकर उनका स्मरण करें। भगवान विष्णु की पूजा में उनकी स्तुति करें। पूजा में तुलसी के पत्तों का भी प्रयोग करें।

Nirjala Ekadashi

पूजा के अंत में विष्णु आरती करें। शाम को भी भगवान विष्णु जी के समक्ष दीपक जलाकर उनकी आराधना करें। इस समय विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। अगले दिन यानि द्वादशी के समय शुद्ध होकर व्रत पारण मुहूर्त के समय व्रत खोलें। सबसे पहले भगवान विष्णु जी को भोग लगाएं।

भोग में अपनी इच्छानुसार कुछ मीठा भी शामिल करें। लोगों में प्रसाद बांटें और ब्राह्मणों को भोजन कर कराकर उन्हें दान-दक्षिणा दें। ध्यान रहे, व्रत खोलने के बाद ही आपको जल का सेवन करना है।

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