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Today is Nirjala Ekadashi: सभी पापों से मुक्ति दिलाता है निर्जला एकादशी व्रत, जानें पूजा विधि और महत्व

संजीवनी टुडे 02-06-2020 08:23:44

हिन्दू धर्म में एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है| ऐसी मान्यता है कि दिन पूजा-पाठ, व्रत, उपवास और दान आदि करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और व्यक्ति को मोक्ष मिलता है।


डेस्क। आज (02 जून मंगलावर) निर्जला एकादशी व्रत रखा जाएगा। निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत संयम साध्य है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है… हिन्दू धर्म में एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है| ऐसी मान्यता है कि दिन पूजा-पाठ, व्रत, उपवास और दान आदि करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और व्यक्ति को मोक्ष मिलता है। ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी और भीमसेनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस एकादशी व्रत में पानी पीना वर्जित माना जाता है इसलिए इस एकादशी को निर्जला कहते है।

Nirjala Ekadashi
निर्जला एकादशी का महत्व:

निर्जला एकादशी का व्रत करने से साल भर की 24 एकादशियों का फल मिलता है| जो लोग वर्ष भर की एकादशी का व्रत न कर सके वो इस निर्जला एकादशी का उपवास करके पूरे 24 एकादशी का फल प्राप्त कर सकते है| हिंदू माह के ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। निर्जला यानी यह व्रत बिना जल ग्रहण किए और उपवास रखकर किया जाता है। इसलिए यह व्रत कठिन तप और साधना के समान महत्त्व रखता है। हिंदू पंचांग के अनुसार वृषभ और मिथुन संक्रांति के बीच शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भोजन संयम न रखने वाले पांच पांडवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर सुफल पाए थे। इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ। 

Nirjala Ekadashi
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का मात्र धार्मिक महत्त्व ही नहीं है, इसका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नजरिए से भी बहुत महत्त्व है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। इस दिन जल कलश, गौ का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष और महिलाओं दोनों द्वारा किया जा सकता है। वर्ष में अधिकमास की दो एकादशियों सहित 26 एकादशी व्रत का विधान है। जहां साल भर की अन्य 25 एकादशी व्रत में आहार संयम का महत्त्व है, वहीं निर्जला एकादशी के दिन आहार के साथ ही जल का संयम भी जरूरी है। इस व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है यानी निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है।

Nirjala Ekadashi

मान्यता

ऐसी धार्मिक मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मात्र निर्जला एकादशी का व्रत करने से साल भर की पच्चीस एकादशी का फल पा सकता है। यहां तक कि अन्य एकादशी के व्रत भंग होने के दोष भी निर्जला एकादशी के व्रत से दूर हो जाते हैं। कुछ व्रती इस दिन एक भुक्त व्रत भी रखते हैं यानी सांय दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का सेवन करते हैं।

पूजा विधि

इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन का त्याग किया जाता है। इसके बाद दान, पुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है। 

धार्मिक महत्त्व की दृष्टि से इस व्रत का फल लंबी उम्र, स्वास्थ्य देने के साथ-साथ सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है। एकादशी के दिन सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करें।

Nirjala Ekadashi

इसके पश्चात ‘ओउम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें। इस दिन व्रत करने वालों को चाहिए कि वह जल से कलश भरे व सफेद वस्त्र को उस पर ढककर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

दान

इस एकादशी का व्रत करके यथा सामर्थ्य अन्न, जल, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखी तथा फलादि का दान करना चाहिए। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। 

इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाएगा तथा संपूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा। इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अविनाशी पद प्राप्त करता है। भक्ति भाव से कथा श्रवण करते हुए भगवान का कीर्तन करना चाहिए।

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