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Bakrid 2020/आज मनाई जाएगी बकरीद, जानिए क्यों याद की जाती है इब्राहिम की कुर्बानी

संजीवनी टुडे 01-08-2020 03:24:00

इस्लामिक कैलेंडर के बारहवें महीने जु-अल-हज्जा के दसवें दिन बकरीद का त्योहर मनाया जाता है।


डेस्क। इस्लामिक कैलेंडर के बारहवें महीने जु-अल-हज्जा के दसवें दिन बकरीद का त्योहर मनाया जाता है। बकरीद को बकरा ईद, ईद-उल-अजहा भी कहा जाता है।इस्लाम धर्म में पैगंबर हजरत इब्राहिम से ही कुर्बानी देने की परंपरा की शुरु की गई थी। ईद-अल फितर के बाद मनाया जाने वाला बकरीद का त्योहार इस्लाम धर्म में काफी महत्व रखता है। रमजाम महीना खत्म होने के करीब 70 दिन बाद मनाए जाने वाले बकरीद को मुख्य रूप से कुर्बानी के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अदा करने के बाद अल्लाह की इबादत में बकरे की कुर्बानी देते हैं। इस साल बकरीद का त्योहार 31 जुलाई से शुरु होगा और 1 अगस्त की शाम को खत्म होगा आइये जानते हैं। इस पर्व का इस्लाम धर्म में काफी महत्व बताया जाता है। बकरीद को आखिर कुर्बानी का त्योहार क्यों कहा जाता है और इसका इस्लाम धर्म में क्या महत्व है, आइये जानते हैं बकरीद के बारे में..... 

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बकरीद कल है
बकरीद का त्योहार इस्लामिक चंद्र कैलेंडर के बारहवें महीने जु-अल-हज्जा के दसवें दिन मनाया जाता है। जो कल है यानि मंगलवार को जु-अल-हज्जा की पहली तारीख का चांद नजर न आने की वजह से इस साल बकरीद का त्योहार 1 अगस्त 2020 को मनाया जाएगा।

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बकरीद पर कुर्बानी का महत्व 
इस्लाम धर्म में पैगंबर हजरत इब्राहिम से ही कुर्बानी देने की परंपरा की शुरु की गई थी। पुरानी  मान्यताओं के अनुसार इब्राहिम अलैय सलाम को कोई भी संतान नहीं थी और जब अल्लाह से काफी मिन्नतों के बाद उन्हें एक संतान हुई तो उसका नाम इस्माइल रखा गया. इब्राहिम अपने बेटे से बेहद प्यार करते थे। मान्यता है कि एक रात अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सपने में आकर उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांगी। उन्होंने एक-एक कर अपने सभी प्यारे जानवरों की कुर्बानी दे दी। लेकिन सपने में एक बार फिर अल्लाह से उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने का आदेश मिला। 

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हजरत इब्राहिम जब अपने बेटे को लेकर कुर्बानी देने जा रहे थे तभी रास्ते में शैतान मिला और उसने कहा कि वह इस उम्र में क्यों अपने बेटे की कुर्बानी दे रहे हैं उसके मरने के बाद बुढ़ापे में कौन उनकी देखभाल करेगा. हज़रत इब्राहिम ये बात सुनकर सोच में पड़ गए और उनका कुर्बानी देने का मन हटने लगा लेकिन कुछ देर बाद वह संभले और कुर्बानी के लिए तैयार हो गए. हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली, हज़रत इब्राहिम ने आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की कुर्बानी दी, लेकिन कुर्बानी के बाद जैसे ही पट्टी हटाई तो अपने बेटे को सामने जिन्‍दा खड़ा पाया क्योंकि अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम के बेटे की जगह 'बकर' यानी बकरे को खड़ा कर दिया था कहा जाता है कि तब से बकरीद पर बकरे की कुर्बानी देने की परंपरा निभाई जाती है।

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