संजीवनी टुडे

प्रदेश में एक के बाद एक चुनावों ने अटकाई भर्तियां एवं विकास कार्य, शहरों एवं गांवों की सरकार चुनने में ही चला गया पूरा साल

-एडवोकेट संदीप कलवानिया, राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर

संजीवनी टुडे 30-11-2020 23:10:00

प्रदेश में एक के बाद एक हो रहे चुनावों ने पूरे सिस्टम को बाधित किया है।


जयपुर। देश एवं प्रदेश में लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक बार की आचार संहिता में ही पूरे करवा लिए जाते है लेकिन इस बार प्रदेश में गांवों और शहरों की सरकार को चुनने में चुनाव आयोग को एक साल से भी ज्यादा का समय लग गया लेकिन अभी तक भी पूरे प्रदेश में गांवों एवं शहरों की सरकार नही चुनी गई है। 

प्रदेश में एक के बाद एक हो रहे चुनावों ने पूरे सिस्टम को बाधित किया है। चुनावों का सिलसिला पिछले साल के अंत में शुरू हुआ जो निरंतर चले आ रहा है। पिछले एक साल की बात की जाए तो प्रदेश में कभी शहरों की सरकार के तो कहीं गांवों की सरकार के चुनाव लगातार हो ही रहे है।  नगरपालिका, नगर निगम सहित पंचायतों के चुनाव एक साल में करीब 7 बार अलग-अलग चुनावों की घोषणा हो चुकी है। बार बार आचार संहिता लगने के कारण लोगों के कई जरुरी काम अटक गए।

प्रदेश में एक साल चुनावों का हाल ये है कि एक चुनाव खत्म होता है कि दूसरे चुनाव का एलान हो जाता है। इस कारण पिछले 12 महीने में से करीब 6 माह तो आचार संहिता में ही बीत गए। इसके अलावा कोरोना का कहर है वो अलग। इससे भी लोगों की परेशानी बढ़ गई है।

बीते एक साल में प्रदेश में कब-कब हुई चुनाव की घोषणा

शहरों की सरकार चुनने के लिए 25 अक्टूबर 2019 को नगरपालिकाओं के लिए (राज्य चुनाव आयोग की वेबसाइट से)

26 दिसंबर 2019 को सरपंच एवं पंच के लिए

12 मार्च 2020 को 6 नगर निगमों के लिए, लेकिन कोरोना के कारण निरस्त करना पड़ा

7 सितंबर 2020 को शेष रही 3848 ग्राम पंचायतों के चुनाव

10 अक्टूबर 2020 को 6 नगर निगमों के चुनाव का एलान

26 अक्टूबर 2020 को 21 जिलों की जिला परिषदों एवं पंचायत समिति के लिए।

7 नवंबर को 42 नगरीय निकायों के लिए

12 ज़िलों में जिला परिषद एवं पंचायत समितियों के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होना शेष

रीट सहित  बड़ी भर्तियां अटकी : रीट की पात्रता में सरकार ने कुछ वर्गों को छूट प्रदान की है। चुनाव आचार संहिता के कारण फाइल अटक गई है।

चुनाव में मतदान प्रतिशत कम हुआ है:- प्रदेश में एक के बाद एक चुनाव होने से मतदाताओं में चुनाव के प्रति उत्साह कम हुआ है। गत दिनों में हुए चुनावों में इसका असर देखने को मिला है।

प्रदेश में कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए पहली बार 22 मार्च से लॉकडाउन का एलान हुआ था। करीब दो महीने के सख्त लॉकडाउन के बाद 20 मई के बाद ही इसमें कुछ छूट मिलना प्रारंभ हुआ था। इसके बावजूद भी कई तरह की पाबंदियां लागू रही थी। लेकिन इन दो महीने में लोगों को जरुरी काम पूरी तरह से अटक गए थे। सरकार का भी पूरा ध्यान कोरोना को रोकने पर ही था।

यह काम अटके:-

अपना कार्यालय का काम छोड़ कर्मचारी चुनावों में लगे रहे - बार बार चुनाव की घोषणा होने से जिला प्रशासन के अधिकारी और कर्मचारियों के अलाव चुनाव ड्यूटी के कारण अन्य कर्मचारी भी चुनाव में ही व्यस्त रहे। सबसे अधिक नुकसान लोगों को जिला प्रशासन से जुड़े कामों के लिए उठाना पड़ रहा है। अन्य विभागों के कर्मचारी भी बार बार चुनाव ड्युटी के कारण अपने कार्यालय को अधिक समय नहीं दे पा रहे।

प्रदेश के लाखों कर्मचारियों के तबादले अटके रहे:-

15 सितंबर से सरकार ने तबादलों पर से प्रतिबंध हटाकर 31 अक्टूबर तक तबादले करने की छूट प्रदान की थी। लेकिन आचार संहिता के चलते अधिकांश डिपार्टमेंटों में तबादले अटके रहे। कई विभागों में तो तबादला सूचियां जारी हो गई। लेकिन शिक्षा विभाग सहित कई बड़े विभागों में कर्मचारी सूचियों का इंतजार करते रहे।

देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था बहुत मजबूत व्यवस्था है। हमारे देश में लोग चुनाव को उत्सव के रूप में मनाते है। चुनावों में राजकोष से बड़ी धन राशि खर्च होती है। बड़ी संख्या में मैन पावर काम में लिया जाता है। देश में कई बार मांग उठ चुकी है कि लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाए जाए ताकि अनावश्यक खर्च होने धन राशि एवं मैन पावर को देश के विकास में काम लिया जा सकें। बार-बार आचार संहिता लगने से सरकारी महकमों में आम जनता के काम नहीं हो पाते और लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरकार को चुनाव आयोग से सामंजस्य बैठाकर इस तरह से प्लानिंग करनी चाहिए ताकि एक साथ चुनाव हो जाए और बार बार आचार संहिता नही लगाई जाए।

ऐसी ही ताजा खबरों व अपडेट के लिए डाउनलोड करे संजीवनी टुडे एप

More From rajasthan

Trending Now
Recommended