संजीवनी टुडे

हर गांव में महिला कंसलटेंट सहित लोकसभा चुनाव में गूंजेंगे ये ट्राइबल मुद्दे

संजीवनी टुडे 11-03-2019 10:17:36


उदयपुर। लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। इसी के साथ संभावित उम्मीदवारों के कयास और मांगों-मुद्दों का दौर शुरू हो चुका है। उदयपुर लोकसभा क्षेत्र में भी चुनावी चर्चाएं चल पड़ी हैं। चूंकि उदयपुर लोकसभा सीट जनजाति बहुल होने के कारण जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित है तो अधिकांश मुद्दे भी जनजाति विकास से जुड़े हैं और पिछले कुछ समय की परिस्थितियों के कारण वे मौजूदा समय में प्रासंगिक भी हो चले हैं और चुनावी समर में अपनी खास भूमिका निभाने वाले हैं। 

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इन्हीं मुद्दों के संदर्भ में हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी ने जनजाति क्षेत्र में सक्रिय स्वयंसेवी संस्थाओं सहित राजनीतिक दलों से चर्चा की तो कुछ ऐसे मुद्दे सामने आए जिसे हर संगठन ने महत्वपूर्ण और जरूरी बताया। इन मुद्दों को लेकर राजनीतिक संगठनों ने न केवल मंथन शुरू किया है बल्कि अपने-अपने घोषणा-पत्रों का हिस्सा बनाने की भी तैयारी शुरू कर दी है। 

इस चर्चा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह उभर कर आई कि जनजाति विकास की योजनाएं तो केन्द्र सरकार के पास भी हैं और राज्य सरकार के पास भी। इन योजनाओं में अच्छा-खासा बजट आता है, लेकिन जानकारी का अभाव इन योजनाओं को ठेठ नीचे जरूरतमंद या पात्र तक पहुंचने में कठिनाई आ जाती है। सीधी सी बात है कुआं प्यासे के पास नहीं जाता, प्यासे को कुएं के पास जाना पड़ता है, लेकिन प्यासे को पता तो हो कि कुआं है, कहां पर है और उस तक कैसे पहुंचा जा सकता है। 

इसी को लेकर विभिन्न योजनाएं की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कंसलटेंट की दरकार है। एक स्थायी सेवक ऐसा हो जिसे सरकार की हर नई योजना की जानकारी का प्रशिक्षण मिले और वह यह जानकारी गांव-ढाणी के लोगों को बताने के लिए उपलब्ध हो। स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता इसके लिए महिला सेवक को मुफीद मानते हैं। क्योंकि यदि कंसलटेंट महिला होगी तो ग्रामीण महिलाएं बेहिचक उनसे अपने मन की बात कह पाएंगी और परिवार की मजबूती के लिए योजनाओं का लाभ उठाएंगी। 

कमोबेश सभी स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं का यही दर्द बयां करते हैं कि अधिकारियों और सरकारी कार्मिकों के पास लोगों को ढांढ़स बंधाने, समझाने, मदद करने, समाधान ढूंढ़ने के लिए समय ही कहां होता है और दूसरे शब्दों में कहें तो वे इसमें रुचि ही कब लेते हैं। यदि वे रुचि लेते तो जनजाति छात्रावास करोड़ों का बजट होने के बावजूद खस्ताहाल नहीं होते, स्कूल और चिकित्सालयों में स्टाफ का अभाव नहीं होता। इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनजर सरकार को एक स्थायी व्यवस्था के बारे में सोचना होगा। 

जनजाति क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता बताते हैं कि जनजाति क्षेत्र में इस तरह की महिला कंसलटेंट गांव-ढाणी में होने से महिला-बालिका कुपोषण की भयावह स्थिति से भी पार पाया जा सकता है। पढ़ी-लिखी महिला कंसलटेंट खान-पान को लेकर भी महिलाओं व बालिकाओं को समझा सकेंगी। गौरतलब है कि जनजाति क्षेत्र की महिलाओं में हीमोग्लोबिन की कमी की समस्या जगजाहिर है। 

हाल ही एक मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वजह से चर्चा में आया है, वह है वनाधिकार पट्टे का मुद्दा। आज भी सरकार ने सामुदायिक वनाधिकार की प्रक्रिया को सरल बना रखा है, लेकिन व्यक्तिगत वनाधिकार मुश्किल ही है। इस प्रक्रिया को भी सरल-सहज बनाने का वादा राजनीतिक दलों को करना ही पड़ेगा क्योंकि यह एक वनवासी के लिए जीने का अधिकार है। इस मुद्दे पर भाजपा-कांग्रेस सहित माकपा के नेताओं ने गंभीरता जताई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर पुनः सुनवाई का रास्ता खोल दिया है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति तो सभी संगठनों को दर्शानी ही होगी। 

सभी के काॅमन मुद्दों में शिक्षा और चिकित्सा भी शामिल हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं पुरजोर तरीके से यह मांग उठाती आई हैं कि शिक्षा और चिकित्सा में नियुक्त होने वाले हर कार्मिक की पहले पांच साल की नौकरी अनिवार्यतः ट्राइबल क्षेत्र में हो और किसी को भी बेवजह राजनीतिक संरक्षण न मिले। यह होने पर यहां का कोई स्कूल खाली नहीं होगा, प्रतिनियुक्ति जैसी गली से निकल भागने की जुगत पर पूरी तरह लगाम लग जाएगी। इससे स्कूलों में होने वाली तालाबंदी और चिकित्सालयों में चिकित्सकों की कमी से होने वाली अनहोनी की घटनाओं का दंश दूर होने की उम्मीद की जा सकती है। 

जनजाति उपयोजना क्षेत्र के कई हिस्सों में खनन महत्वपूर्ण व्यवसाय है जो जनजाति वर्ग को रोजगार उपलब्ध करा रहा है, लेकिन इससे टीबी व एस्बेस्टोसिस जैसी बीमारियां उनके जीवन के लिए खतरा बन रही है। इससे बचाव के उपाय और उपचार की बेहतर सुविधाओं की दरकार उन क्षेत्रों को है ताकि जीवन बचाया जा सके। 

अब पिछले कुछ समय में उभर कर आए मुद्दों की बात करें तो जनजाति आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट सबसे ऊपर आते हैं। डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र में जनजाति वर्ग में यह धारणा बैठ गई कि उनका आरक्षण कम हो गया है। चूंकि जनजाति उपयोजना क्षेत्र में नियमानुसार 45 प्रतिशत तो जनजाति वर्ग के लिए ही आरक्षण है, लेकिन बिना किसी तथ्य के यह बात फैल रही है कि इसे कम करने का प्रयास किया जा रहा है। 

हकीकत को समझाने का प्रयास न केवल भाजपा कर रही है, बल्कि कांग्रेस भी समझा रही है कि किसी का हक नहीं मारा गया है। भाजपा तो सरकार में होने के कारण यह बात कहती रहती है, लेकिन कांग्रेस के बांसवाड़ा के एक वरिष्ठ नेता ने पिछले दिनों प्रेसवार्ता में एक सवाल के जवाब में यह बात कही कि भ्रामक प्रचार के चलते वागड़ क्षेत्र के जनजाति युवा भ्रमित हो रहे हैं। 

यही स्थिति एससी-एसटी एक्ट को लेकर है जिसके बारे में कतिपय संगठन भ्रामक प्रचार कर युवाओं को भ्रमित कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आए अध्यादेश में एक नई बात और जोड़ी जा चुकी है कि अब ईसाई व मुस्लिम वर्ग के किसी व्यक्ति द्वारा भी ऐसा कृत्य किया जाता है तो उस पर भी कार्रवाई होगी, जबकि इससे पहले ये वर्ग शामिल नहीं थे। 

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मुख्य रूप से ये मुद्दे उभरे हैं जिन पर सभी को गंभीर होना होगा, हालांकि इनके अलावा भी छोटे-मोटे कई मुद्दे हैं जो अलग-अलग क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुसार हैं, उन्हें भी स्थानीय नेताओं ने चर्चा कर सूचीबद्ध करना शुरू कर दिया है। 

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