संजीवनी टुडे

विपक्ष में बिखराव बना उनकी दुर्गति का सबब

संजीवनी टुडे 23-05-2019 19:49:33


नई दिल्ली। भाजपा ने जिस तरह से 2019 के लोकसभा चुनाव में भी पूर्ण बहुमत हासिल किया है, उसका एक बड़ा कारण विपक्षी दलों में बिखराव होना है। पूर्व सांसद हरिकेश बहादुर का कहना है कि कुछ राज्यों में  कुछ विपक्षी दलों में बहुत खींचतान के बाद चुनावी तालमेल या गठबंधन हुआ भी तो प्रत्याशी अच्छे नहीं दिये। बाद में चुनाव प्रचार में खींचतान रही। धन व संसाधन की भी कमी थी। इसके अलावा भी कई ऐसी वजहें रहीं, जिसके कारण इनकी (विपक्षी दलों की) करारी हार हुई है।

 

दिल्ली में आम आदमी पार्टी का कांग्रेस से गठबंधन नहीं होने की वजह ‘आप’ के संयोजक अरविन्द केजरीवाल रहे। वह दिल्ली में गठबंधन अपनी शर्तों पर करना चाहते थे। साथ में हरियाणा व पंजाब में भी सीट चाहते थे जबकि कांग्रेस केवल दिल्ली में गठबंधन करके लड़ना चाहती थी। इस तरह आप के अरविन्द केजरीवाल के कारण कांग्रेस से गठबंधन नहीं हो पाया। नतीजनत, दोनों अपना बंटाधार कर लिये। अब दिल्ली में  आगामी विधानसभा चुनाव में भी दोनों का यही हश्र होने की संभावना है। यदि गठबंधन करके नहीं लड़े तो आगामी विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा आ जायेगी।

उ.प्र. में सपा-बसपा – रालोद गठबंधन में यदि कांग्रेस शामिल हो गई होती तो स्थिति और बेहतर हो गई होती लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने किसी दबाव में और कांग्रेस कहीं रिवाइव न कर जाये, इस डर से अड़ कर कांग्रेस से गठबंधन नहीं होने दिया। इसका खमियाजा सपा-बसपा – रालोद व कांग्रेस चारों को भुगतना पड़ा। यदि गठबंधन हुआ होता तो बसपा व सपा को और सीटें मिली होतीं, कांग्रेस को भी फायदा होता। वरिष्ठ पत्रकार नवेन्दु का कहना है कि उ.प्र. की 80 लोकसभा सीटों का जो चुनाव परिणाम आया है, उससे लगता है कि राज्य में तीन साल बाद विधानसभा चुनाव में भी विपक्षी दलों की राह बहुत कठिन होगी।

प.बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी लोकसभा चुनाव में न तो कांग्रेस, न ही वामपंथी दलों से तालमेल की। माकपा के प्रकाश कारात ने दबाव बनाकर अपनी पार्टी का कांग्रेस से तालमेल नहीं होने दिया जबकि सीताराम येचुरी कांग्रेस से तालमेल करके लड़ना चाहते थे। इस तरह राज्य में कांग्रेस, वामपंथी दल व तृणमूल कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़े और तीनों को नुकसान हुआ। इसका फायदा भाजपा को मिला। इस लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा की सीटें कई गुना बढ़ गईं।  

गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार डा. हरि देसाई का कहना है, “यदि सभी विपक्षी दल लोकसभा चुनाव के पहले ही तालमेल करके प्रत्याशी तय किये होते और एक मंच पर आकर चुनाव प्रचार किये होते तो विपक्षी दलों की स्थिति थोड़ी बेहतर होती।

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यह नहीं करके तमाम विपक्षी दल अपनी – अपनी जागीर बचाने के लिए एक दूसरे से तालमेल करने से बचते रहे और एक दूसरे के विरूद्ध लड़े, क्योंकि इनमें से ज्यादातर नेता प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते रहे। वे लोग यह भूल गये कि किससे पाला पड़ा है? अब आगे पता चल जायेगा। यदि अब भी एकजुट नहीं हुए तो फिर अगले पांच साल में इनमें कई दल लगभग अस्तित्व विहीन हो जायेंगे।

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