संजीवनी टुडे

तापमान 45 डिग्री, रेगिस्तानी कहर की तरफ बढ़ रहा शाजापुर

संजीवनी टुडे 30-05-2019 22:37:54


शाजापुर। मई माह के अंतिम सप्ताह की शुरूआत से शाजापुर का तापमान 44-45 डिग्री बना हुआ है, जिसके चलते यहां का आमजनजीवन पूरी तरह प्रभावित हो रहा है। गर्मी के तीखे तेवरों का आलम यह है कि सुबह से शाम तक बाजारों में सन्नाटा छाया है तो लू की चपेट में आने वाले मरीजों की लंबी कतारें अस्पतालों में लगी हुई हैं। सडक़ों का डामर पिघलने लगा है तो घरों की छतों पर रखी टंकियों में भरा पानी ऊबलकर जिस्म जलाने की स्थिति में पहुंच गया है। कुल मिलाकर सूरज के तीखे तेवरों से जलता तवा बन चुकी धरती पर गर्मी से बचने के तमाम जतन बेकार साबित हो रहे हैं। एसे में एक ही बात रह-हरकर जहन में उठ रही है कि कहीं ये शाजापुर के रेगिस्तान की तरफ बढ़ते कदमों का कुदरती संकेत तो नही...

गर्मी के चढ़ते पारे के कारण प्राकृतिक आपदा बनकर धरती पर बरस रहे सूर्यदेवता के कहर को झेलने पर मजबूर शहरवासियों की मुसीबत के कारणों पर यदी नजर डाली जाए तो उनके आसपास के असंतुलित पर्यावरण को बहुत हद तक इसका उत्तरदायी समझा जा सकता है। नगर के अधिकांश इलाकों में फेलते रहवासी दायरे तथा बढ़ती इमारतों की संख्या ने वृक्षों की अंधाधुंध कटाई करके मनुष्य को रहने के लिए पर्याप्त स्थान तो दिलवा दिए किन्तु प्राकृतिक संपदा के निरन्तर अबाध गति से होने वाले दोहन, वृक्षों की निरन्तर कम होती संख्या तथा मानव समाज द्वारा इस भीषण समस्या के प्रति हमेशा बरती गई लापरवाही ने आज शहर को वृक्षविहिन क्षैत्र बनाकर विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं की सौगातें भी देना शुरू कर दी है। क्षेत्र के अनेक ईलाकों में जहां कभी बीते दौर में हरे-भरे और घने कतारबद्ध वृक्ष राहगीरों व वहां के निवासियों को अपनी शीतल छांव तथा ताजी हवा में सुकुन देते हुए प्राकृतिक सौन्दर्य को प्रदर्षित करते दिखाई देते थे वहां आज गगनचुंबी इमारतों व शापिंग कॉम्पलेक्सों की बढ़ती संख्या ने उन इलाकों को वृक्षों की शीतल छांव से वंचित कर दिया है। कुछ स्वार्थी लोगों द्वारा हरियाली का दोहन करने के लिए बेहरमी से वृक्षों पर चलाई गई महत्वाकांक्षा की आरी के कारण आज अधिकांश शहरी क्षैत्र वृक्षविहिन होकर भीषण गर्मी में सूर्यदेवता के प्रचंड प्रकोप को झेलने पर मजबूर हो चुका हैं।

विकास के नाम पर होता गया विनाश
पुराने समय में जंगलों से घिरा शाजापुर का शहरी क्षैत्र वैसे तो आज भी जंगलों की ही पहचान दर्शाता हुआ प्रतीत होता है, जिसमें दरख्तों का स्थान कांक्रीट की इमारतों ने ले लिया है और लोगों की सोच प्रकृति मित्र होने के स्थान पर पूर्णत: स्वार्थी बन चुकी है। आज शहर के बीचों-बीच बस चुकी अनेक कॉलोनियां जो किसी समय पुराने शाजापुर का बाहरी इलाका हुआ करती थी तथा एक समय बड़ी संख्या में छायादार वृक्षों से आच्छादित रहती थी। वर्तमान समय में विकास की चाह में कॉलोनिया बनाने के लिए शने:-शने: उन क्षैत्रों में किया गया हरे-भरे और घने वृक्षों का दोहन अब विनाश सा प्रतीत होता नजर आ रहा है।

विरान हो गए हरे-भरे वृक्षों से सघन क्षेत्र 
गर्मी के मौसम में पारे के तीखे तेवरों को झेलने ओर शहरी इलाके का अधिकांश भाग वृक्षविहिन होने के लिए केवल शहर की नई कॉलोनियों में हुए निर्माण कार्य ही जिम्मेदार नहीं है वरन् शहरी क्षत्र में आरा मशीनों की बढ़ती संख्या, शासकीय निर्माण कार्य और अंधाधुंध वृक्ष कटाई ने भी सघन वन क्षेत्र को विरान बनाने में अहम भूमिका निभाई है। 

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परिंदों के लिए दोहरी मुसीबत
वृक्षों पर निवास करने वाले पक्षियों के लिए गर्मी का मौसम वैसे ही लाख मुसीबतों भरा होता है, एसे में उनके रहने के लिए कम होती वृक्षों की संख्या गर्मी के मौसम में उनकी मौत का कारण भी बन जाती है। पर्यावरण का संतुलन बनाने और मनुष्य का जीवन सुखद बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इन प्राकृतिक उपहारों की उपेक्षा मानव समाज के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है और इस पर विडम्बना यह है कि इनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है। कुछ यही हाल मवेशियों के भी होते जा रहे हैं और उन्हें भी छांवभरी राहत पाने के लिए काफी संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है।

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