संजीवनी टुडे

एस जयशंकर को विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री मोदी का ‘मास्टर स्ट्रोक’

संजीवनी टुडे 31-05-2019 20:11:06


नई दिल्ली।  राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में गुरुवार शाम को नरेन्द्र मोदी और उनकी मंत्रिपरिषद के शपथ ग्रहण समारोह के बाद इस बात को लेकर काफी असमंजस था कि पिछली सरकार के किस मंत्री का पोर्टफोलियो अबकी बार किसको मिलेगा। खासतौर पर विदेश और गृह मंत्रालय को लेकर ज्यादा कयास लगाये जा रहे थे। हालांकि विदेश मंत्रालय के लिए पूर्व राजनयिक एस. जयशंकर मजबूत दावेदार के रूप में थे।

इन तमाम अटकलों पर शुक्रवार दोपहर बाद तब विराम लग गया, जब राष्ट्रपति भवन से मोदी मंत्रिपरिषद के विभागों के आवंटन की सूची जारी हुई। एस जयशंकर को नए विदेश मंत्री के रूप में जिम्मेदारी मिली। फिलहाल 64 वर्षीय जयशंकर संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसलिए मोदी मंत्रिपरिषद में उनको शामिल किया जाना चौंकाने वाला रहा है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि मोदी ने पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर को विदेश मंत्री नियुक्त करके एक बहुत बड़ा ‘मास्टर स्ट्रोक’ खेला है।

एस जयशंकर ने दिल्ली के सेंट स्टीफन्स कॉलेज से राजनीति विज्ञान में एमफिल करने के बाद जेएनयू से पीएचडी की। भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के 1977 बैच के अधिकारी रहे जयशंकर की पहली पोस्टिंग रूस के भारतीय दूतावास में हुई। वह रूसी भाषा के विशेषज्ञ भी हैं। उन्होंने शुरू में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के प्रेस सचिव के रूप में कार्य किया था। 

जयशंकर विदेश मंत्रालय में अंडर सेक्रेटरी, अमेरिका में भारत के प्रथम सचिव, श्रीलंका में भारतीय सेना के राजनैतिक सलाहकार, टोक्यो और चेक रिपब्लिक में भारत के राजदूत और चीन में भी भारत के राजदूत रह चुके हैं। चीन के साथ बातचीत के जरिये डोकलाम गतिरोध को हल करने में जयशंकर की बड़ी भूमिका मानी जाती है। उन्हें अमेरिका के अलावा चीनी मामलों के विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने चीन और भारत के बीच तनाव को कम करके संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वह चीन में देश के सबसे लंबे समय तक राजदूत रहे। जयशंकर को यह श्रेय है कि कश्मीरियों के लिए चीन द्वारा जारी किए गए स्टेपल वीजा को समाप्त करने को लेकर उन्होंने काफी मेहनत की।
भारत-अमेरिका संबंधों के विशेषज्ञ जयशंकर ने वर्ष 2007 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर बातचीत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस समझौते की शुरुआत 2005 में हुई थी और 2007 में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली संप्रग सरकार ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा सभी ने भारत और अमेरिका के बीच आईएफएस अधिकारी देवयानी खोब्रागड़े विवाद को सुलझाने में जयशंकर के प्रयासों की सराहना की थी।

राजनयिक करियर की पृष्ठभूमि वाले जयशंकर को प्रधानमंत्री मोदी ने जनवरी 2015 में विदेश सचिव के रूप में चुना था। तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह को पद से हटाकर जयशंकर की नियुक्ति की गई थी। सुजाता सिंह को हटाने के सरकार के फैसले पर विभिन्न तबकों ने तीखी प्रतिक्रिया जताई थी। हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह साल 2013 में जयशंकर को ही विदेश सचिव नियुक्त करना चाहते थे, लेकिन अंतिम समय में उन्होंने सुजाता सिंह को यह पद सौंपा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2014 में राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की पहली अमेरिका यात्रा के दौरान जयशंकर ने मोदी का ध्यान आकर्षित किया था। जयशंकर वाशिंगटन डीसी में भारत के राजदूत के रूप में कार्यरत थे। मोदी ने उस यात्रा के दौरान मेडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय प्रवासियों को संबोधित किया था। उस समय जयशंकर ने मोदी की इस यात्रा की योजना तैयार करने और इसे सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने नीतियों को धार दी और 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद राहत एवं बचाव कार्यों, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह, जापान परमाणु वार्ता और डोकलाम पर बेहतरीन भूमिका निभाई। 

इससे पहले 2012 में जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में चीन के दौरे पर थे, उसी दौरान जयशंकर उनसे मिले थे। दोनों के बीच हुई उस मुलाकात के बाद से जयशंकर मोदी के विश्वसनीय हो गए। मोदी के करीबी होने का अंदाजा इसी बात से चलता है कि बतौर विदेश सचिव जयशंकर का कार्यकाल 2017 में ही समाप्त होने वाला था, लेकिन जयशंकर को विदेश सचिव के रूप में एक साल का सेवा विस्तार भी दिया गया था।

नए विदेश मंत्री जयशंकर की पहचान एक सख्त और सफल वार्ताकार के रूप में भी है। विदेश सेवा में उनके कार्यकाल और कूटनीतिक पोस्टिंग ने उन्हें प्रतिष्ठा दिलाई है। जयशंकर को इस जनवरी में पद्मश्री सम्मान मिल चुका है। अपनी सरकारी सेवा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद जयशंकर ग्लोबल कॉरपोरेट मामलों के अध्यक्ष के रूप में टाटा समूह में शामिल हो गए, लेकिन उन जैसे क्षमतावान शख्सियत के लिए वह उपयुक्त स्थान नहीं था। 

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नए विदेश मंत्री के रूप में उनके समक्ष विश्व स्तर खासकर जी-20, शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स संगठन जैसे वैश्चिक मंचों पर भारत के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने की उम्मीदों को अमल में लाने की जिम्मेदारी भी रहेगी। उनके नेतृत्व में मंत्रालय के अफ्रीकी महाद्वीप के साथ सहयोग प्रगाढ़ बनाने पर जोर देने की उम्मीद है, जहां चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ा रहा है। इसके साथ ही जयशंकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से घेरने के लिए मोदी सरकार का सबसे विश्वसनीय और सफल व्यक्ति साबित हो सकते हैं।

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