संजीवनी टुडे

राजद – बसपा मिलाकर महागठबंधन बना तो भाजपा को होगा भारी नुकसान

संजीवनी टुडे 14-01-2019 16:27:58


नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव का रविवार को उत्तर प्रदेश का दौरा खासा महत्व रखता है। समाजवादी पार्टी (सपा)के प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) की अध्यक्षा सुश्री मायावती से उनकी भेंट के गहरे अर्थ हैं। खासकर तब जब 23 साल की दुश्मनी भुलाकर एक दिन पहले ही सपा-बसपा ने गठबंधन की घोषणा की। तेजस्वी यादव के दौरे और मुलाकात से बिहार में भी राजद-बसपा गठबंधन की सुगबुगाहट को बल मिला है।

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बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 2009 के लोकसभा चुनाव से लगभग दोगुना दलित वोट मिला था। यदि राज्य में बसपा व राजद का गठबंधन हो गया और यह गठबंधन कांग्रेस , रालोसपा, हम ,शरद यादव की लोकतांत्रिक जनता दल के साथ भी तालमेल करके चुनाव लड़ा, तो 2014 में भाजपा की तरफ गये वोट 2019 में इस गठबंधन की तरफ आ सकते हैं। 

इसके अलावा भाजपा की सहयोगी रामविलास पासवान की लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी ( लोजपा) के भी आधे से अधिक दलित वोट इस गठबंधन को मिल सकते हैं। इसलिए उ.प्र. की सपा – बसपा गठबंधन की तरह बिहार में राजद – बसपा गठबंधन भी केन्द्र व राज्य की सत्ताधारी पार्टी के लिए चुनौती साबित हो सकता है। 

इस बारे में बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर का कहना है कि राजद प्रमुख लालू प्रसाद की टोपी से कब क्या निकल जाये, यह कोई नहीं जानता है। लेकिन यदि राज्य में राजद का बसपा से गठबंधन हो गया तो इसका असर तो पड़ेगा। विशेषकर उ.प्र. से सटे विधानसभा व लोकसभा सीटों पर , जहां विधानसभा चुनाव में बसपा कुछ सीटें जीतती है। 

सुरेन्द्र किशोर का कहना है कि बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। राजद का जिन राजनीतिक दलों से पहले से तालमेल है और जिनसे अभी तालमेल की बातचीत चल रही है , उनके लिए ही सीटें पूरी नहीं पड़ रही हैं, ऐसे में बसपा से तालमेल करने के बाद लालू उसको लोकसभा की ज्यादा तो नहीं पर एक सीट तो दे ही सकते हैं। 

माना जा रहा है कि गठबंधन होने पर उ.प्र. के देवरिया संसदीय क्षेत्र से सटे बिहार की गोपाल गंज लोकसभा सीट बसपा को दे सकते हैं । इसी तरह से सपा के लिए वह एक सीट छोड़ सकते हैं ,जिस पर बिहार के पूर्व सांसद व राज्य सपा अध्यक्ष देवेन्द्र यादव चुनाव लड़ सकते हैं। इसके बदले में सपा उ.प्र. में राजद को एक सीट दे सकती है । वहीं गठबंधन होने पर बिहार में अक्टूबर – नवम्बर 2020 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव में बसपा के लिए कई सीटें छोड़ी जा सकती हैं। यह होने पर बसपा को बिहार में पांव पसारने का मौका मिल सकता है। 

एक बड़ी सर्वे एजेंसी के बिहार व झारखंड प्रमुख रहे वरिष्ठ पत्रकार मनोज का कहना है कि बिहार में यदि राजद-बसपा गठबंधन हो गया तो यह केवल राजद-बसपा गठबंधन नहीं रहेगा , यह बढ़कर राजद, बसपा, कांग्रेस, सपा, लोजसपा, हम (हिन्दुस्थान आवाम पार्टी) व लोजद का महागठबंधन हो सकता है। जो उ.प्र. में हुए सपा - बसपा गठबंधन से भी अधिक प्रभावी हो जायेगा। यह गठबंधन भाजपा, जदयू, लोजपा की सीटें आधी कर सकता है । 

राजद के वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद जगदानंद का कहना है कि बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों की जनसंख्या 51 प्रतिशत है। इनमें यादव 14 प्रतिशत , कोइरी या कुशवाहा 08 प्रतिशत ,कुरमी 04 प्रतिशत, अति पिछड़ी जातियां 26 प्रतिशत, तेली 03.2 प्रतिशत हैं। मुस्लिम 16.9 प्रतिशत हैं। दलित व महादलित 16 प्रतिशत हैं । जिसमें से दलित 05 प्रतिशत, दुसाध 05 प्रतिशत, मुसहर 02.8 प्रतिशत हैं। अगड़ी जातियां 15 प्रतिशत हैं , जिनमें से भूमिहार 06 प्रतिशत, ब्राह्मण 05 प्रतिशत, राजपूत 03 प्रतिशत और कायस्थ 01 प्रतिशत हैं। 

जगदानंद का कहना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में राजद, जदयू, भाजपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। फिर भी राजद के वोट कम नहीं हुए थे। राजद को 2014 में 20.10 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2009 में मिले वोट से 00.8 प्रतिशत अधिक थे। 2014 के चुनाव में सबसे अधिक नुकसान जदयू को हुआ था। उसके 08.42 प्रतिशत वोट घट गये थे । इसी तरह से कांग्रेस के वोट 01.86 प्रतिशत कम हो गये। ये वोट भाजपा को चले गये। 

इनके अलावा कुछ फ्लोटिंग व दलित वोट मिलने के कारण भाजपा के वोट 15.47 प्रतिशत बढ़कर 29.40 प्रतिशत हो गये। उसको राज्य की 40 में से 22 सीटें मिलीं । लेकिन राजद, बसपा , कांग्रेस, रालोसपा, हम, सपा का महागठबंधन बन गया तब लोकसभा चुनाव में लगभग 40 प्रतिशत वोट मिल सकता है। जिसके चलते भाजपा, जदयू, लोजपा का राजग गठबंधन राज्य की 40 में से लगभग 12 पर सिमट सकता है। 

इस मुद्दे पर उ.प्र. के वरिष्ठ पत्रकार नवेन्दु का कहना है कि बिहार में राजद ने यदि बसपा व सपा से गठबंधन कर लिया और इन दोनों के लिए एक-एक लोकसभा सीट छोड़ दिया, तब सपा व बसपा को उ.प्र में भी राजद के लिए कम से कम एक सीट छोड़नी पड़ेगी। राजद का उ.प्र. में कोई असर नहीं है फिर भी इस तरह के समझौते से दोनों राज्यों के मतदाताओं में, विशेषकर यादवों, दलितों ,मुसलमानों में एकजुटता का माहौल बनेगा। दोनों राज्यों में ये एकजुट होकर सपा,बसपा,राजद व इनके सहयोगी दलों को वोट देंगे। इससे सबसे अधिक नुकसान दोनों जगह भाजपा व उसके सहयोगी दलों को होगा।

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यह भाजपा को उ.प्र व बिहार में सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाला गठबंधन साबित होगा। क्योंकि उ.प्र. में लोकसभा की 80 और बिहार में 40 सीटें हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में दोनों राज्यों के कुल 120 लोकसभा सीटों में से 93 (उ.प्र. में 71 , बिहार में 22 ) पर भाजपा जीती थी। यदि इन दोनों राज्यों में मिलाकर भाजपा 60 लोकसभा सीटें हार गयी, तब केन्द्र में सरकार बनाना मुश्किल हो जायेगा। इस बारे में भाजपा सांसद वीरेन्द्र सिंह का कहना है कि किसी को सपना देखने से तो रोका नहीं जा सकता है। जनता इनके झांसे में आ

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