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रामभक्तों, कारसेवकों एवं हजारों बलिदानियों के साथ ही मेरा सपना भी हुआ पूर्ण: दिलीप कुमार

संजीवनी टुडे 05-08-2020 21:00:22

1990 में हजारों कारसेवकों ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दे दी।


कछार। "राम नाम की ओढ़ के चादर, हमें अयोध्या जाना है। मर जाएंगे मिट जाएंगे, मंदिर भव्य बनाना है।" लाठी गोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। जहां राम का जन्म हुआ है, मंदिर वहीं बनाएंगे। राम लला हम आएंगे, मंदिर भव्य बनाएंगे। हम हिंदू अयोध्या जाएंगे, प्राणों की बलि चढ़ाएंगे, चाहे जितना खून बहे, पर मंदिर वहीं बनाएंगे, आदि नारों के साथ 1990 में हजारों कारसेवकों ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दे दी। 

ये बातें 'प्रेरणा भारती' दैनिक समाचार पत्र के प्रकाशक, पत्रकार, आरएसएस के पूर्व प्रचारक, वर्तमान में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के एकेडमिक काउंसिल के सदस्य तथा दक्षिण असम के विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े दिलीप कुमार ने बुधवार को अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के अवसर पर कही। 

उन्होंने बताया कि राम मंदिर आंदोलन के समय मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक अंतिम वर्ष का विद्यार्थी था। साथ में इंस्टीट्यूट आफ इंजीनियरिंग एंड रूरल टेक्नोलॉजी से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग कोर्स भी कर रहा था। मैं भी सब छोड़कर साध्वी ऋतंभरा के एक आह्वान पर आंदोलन में कूद पड़ा। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह सरकार ने अयोध्या जाने के सारे रास्तों को सील कर दिया था और चुनौती दी थी कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। ऐसे में इलाहाबाद से पूज्य शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के जत्थे के साथ ही मैं अयोध्या के लिए पैदल निकल पड़ा।‌ 03 दिन 03 रात पैदल चलकर, पुलिस के लाठी डंडे खाते हुए, नदी नाला पार कर 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचा था।

30 अक्टूबर को कारसेवा हो चुकी थी। अशोक सिंघल जी घायल थे, उनके सिर से खून बह रहा था। 02 दिन का विश्राम था। 02 नवम्बर की कारसेवा में मैं सुश्री उमा भारती के नेतृत्व में भाग लिया था। एक ओर से उमा भारती और दूसरी तरफ से विनय कटियार के नेतृत्व में कारसेवकों का जत्था राम जन्म भूमि की ओर बढ़ा था। पहले आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठीचार्ज हुआ फिर फायरिंग हुई। मैंने भी आंसू गैस के गोले और पुलिस की लाठियां खाई थी, मार खाते-खाते मैं बेहोश हो गया था। कारसेवक मुझे मरा हुआ समझकर दिगंबर अखाड़ा में उठा ले गए थे, इसलिए मैं बच गया।

उन्होंने बताया कि मैंने अपनी आंखों से अयोध्या में बर्बर अत्याचार को देखा था। खून से रक्त रंजित सड़कें और गलियां देखीं, कारसेवकों की लाशें देखीं। उसी दिन से मैंने यह संकल्प लिया कि अब यह शरीर राम कार्य के लिए समर्पित कर दूंगा। इलाहाबाद में हमने श्रीराम युवा चेतना मंच का गठन किया। 01 साल आंदोलन पर आंदोलन करते-करते संघ का प्रचारक बन गया। 10 साल उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र और असम के बराक वैली में प्रचारक के नाते काम किया। 2001 में प्रचारक जीवन से मुक्ति लेने के बाद भी एकल विद्यालय योजना, रामकथा योजना, रथ योजना, ग्राम विकास योजना आदि के लिए काम किया। सेवा भारती के लिए, धर्म जागरण विभाग के लिए भी काम किया।

दिलीप कुमार ने कहा कि मन में एक संकल्प था, यह जीवन राम कार्य के लिए समर्पित है। जब तक राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण न हो जाए समर्पित ही रहेगा। आज सपना पूरा हुआ, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के शुभारंभ के साथ ही मैं अपने संकल्प से मुक्त हुआ। मैं पिछले 10-15 दिनों से अस्वस्थ हूं फिर भी आज शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। एक नए जीवन का संचार हुआ है। पूज्य डॉक्टर जी ने कहा था, "याची देह, याची डोला" इसी शरीर से और इन्हीं आंखों से हिंदू राष्ट्र के स्वप्न को साकार होते हुए देखूंगा। आज संघ के करोड़ों स्वयंसेवकों की आंखों से डॉक्टर जी एक-एक करके अपने सपनों को साकार होते हुए देख रहे हैं।

उन्होंने कहा है कि इसके लिए मैं उच्चतम न्यायालय, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का आभार व्यक्त करता हूं। साथ ही उन हजारों बलिदानियों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, जिन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।

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