संजीवनी टुडे

लॉकडाउन के चलते अपने क्षेत्रों में सक्रिय हुए नेता,कोई कसर नहीं छोड़ रहे नाम चमकाने में

बनवारी चन्दवाडा

संजीवनी टुडे 07-04-2020 12:04:53

चुनावों या किसी ऐसे अवसर जंहा नाम चमकाया जायेगा नेता लोग कोई कसर नहीं छोड़ते।


डेस्क। भारत यह वो देश है जहां सबको अपनी राजनीति करने का अधिकार है, ये राजनीती  एक समय पर जोर पकड़ती हुई दिखाई देती है तो कभी दुबककर बैठने पर भी मजबूर कर देती है। बरसात के मौसम में जैसे मेंढकों की आवाज़ सुनाई देना एक आम बात लगती है वही चुनावों या किसी ऐसे अवसर जंहा नाम चमकाया जायेगा नेता लोग कोई कसर नहीं छोड़ते।इस वक़्त देश ही नहीं दुनिया के ताकतवर देश भी कोरोना के आगे पस्त दिखाई पड़ते है। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है अमेरिका जैसे देश जिनकी दुनिया में तूती  बोलती थी आज ऐसी जगह खड़े है जंहा कुछ करते नहीं बन रहा है। 

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(सेनिटाइज़ करने वाली पिपियों पर राजस्थान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पुनिया की छाप )

वही भारत में भी परिस्थितिया बद से बदतर हो जा रही है। देश में लॉकडाउन के चलते अर्थव्यवस्था तो पटरी से उतर ही रही है साथ ही देश के लाखो दिहाड़ी मजदूरों, नित कमाकर अपनी रोजी- रोटी चलाने वालो पर भी संकट आ खड़ा हुआ है। ऐसे में सरकार के साथ समाजसेवी ,संस्थाएं,संगठन व राजनेता भी कंधे से कन्धा मिालकर चल रहे है और अपना भरसक प्रयास कर रहे है कि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोये। सुबह शाम का खाना हर जरूरतमंद तक पंहुचा रहे है। प्रत्येक व्यक्ति अपने -अपने स्तर पर क्षमतानुसार सुविधाएं उपलब्ध करवा रहा है। 

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(आटे के कट्टे पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व स्थानीय नेता का फोटो) 

इसी के साथ देश की विशेषता रही है कि हर चीज में राजनीति का अड़ंगा लगा दिया जाता है। लॉकडाउन के चलते पक्ष -विपक्ष में तो अरोप -प्रत्यारोप का दौर तो जारी है ही लेकिन इस महामारी पर एकजुट होकर लड़ने की कसमें भी खाते हुई देखी जा सकती है। वही गलियों कस्बों में आगामी चुनाओं की तैयारी कर रहे लोगो को राशन बांटते हुए राशन की थैलियों पर उनके  नेता की फोटो साफ़ तौर पर चुनावी प्रचार के रूप में देखी जा सकती है। इसका तात्पर्य ये है कि अभी हमने आपका धयान रखा बाद में आप हमारा रखे और खास बात ये भी की  नेता उसी क्षेत्र में अपना डेरा डालते है जंहा इनका अपना एक बड़ा वोट बैंक तैयार हो। लेकिन मजाल ये अपने क्षेत्र की  दहलीज लांघ कर दूसरे क्षेत्र में चले जाय क्योकि वोट का सवाल जो है। 

अब सवाल ये उठता है कि क्या ऐसी स्तिथि में भी हमे इस सामाजिक सरोकार को  राजनीति की भेंट चढ़ा देनी चाहिए। क्या श्रेय लेने की ये होड़ इस हद तक जा पहुंची है कि हम खाने के पैकेट के साथ अपनी फोटो व पार्टी का नाम भी उस गरीब तक पहुंचा रहे है। उस गरीब को दो वक़्त का भरपेट भोजन चाहिए आपकी राजनीति नहीं, बेहतर होगा इस वैश्विक महामारी से लड़ने के लिए हम एक और स्तर ऊपर उठ के सोचे और निःस्वार्थ सेवा भाव के साथ इसको जड़ से उखाड़ फेकने में भरसक प्रयास करे। 
यकीन कीजिये हमारे द्वारा की गई सेवा का फल ईश्वर हमें जरूर प्रदान करेगा। भोजन के पैकेट पर ठप्पा लगाए न लगाए ईश्वर के खाते में आपके नाम का ठप्पा जरूर लग जायेगा। हालाँकि इनके द्वारा किये जा रहे कार्य कबीले तारीफ है लेकिन यह राजनीति से अछूते हो तो खाने का जायका और बड़ जायेगा। 

अक्सर देखा जाता है किसी भी आपातकाल के समय कालाबाजारी अपने चरम पर पहुँच ही जाती है क्योकि वो जानते है कि लोगो की ये अभी आवश्यकता है और मन मुताबिक दाम वसूलने का सही समय है।कोरोना के चलते मास्क व सेनिटाइजर की कालाबाजारी कोई नई बात नहीं है लेकिन सरकार के दखल के बाद कीमतों में बदलाव करना पड़ा व दोषियों पर कार्यवाही का भी प्रावधान करना पड़ा। 
इसलिए हमें गौर करना पड़ेगा की ये हमारे देश की संस्कृति नहीं है हमें अपनी संस्कृति व परंपरा को जीवित रखने के लिए उसी विचारधारा चलना पड़ेगा जिस के लिए हम जाने जाते है।     

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