संजीवनी टुडे

(लीड) पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों की हड़ताल से चिकित्सा सेवाएं ठप, दर्द से बिलखते रहे मरीज

संजीवनी टुडे 12-06-2019 22:05:41

नील रतन सरकार (एनआरएस) मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक रोगी की मौत के बाद उसके परिजनों की जूनियर डॉक्टरों के साथ हुई मारपीट की घटना को लेकर राज्यभर के अधिकतर सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा सेवाएं ठप हैं


कोलकाता। नील रतन सरकार (एनआरएस) मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक रोगी की मौत के बाद उसके परिजनों की जूनियर डॉक्टरों के साथ हुई मारपीट की घटना को लेकर राज्यभर के अधिकतर सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा सेवाएं ठप हैं। मरीजों को इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। बुधवार को हड़ताल का दूसरा दिन था। हड़ताली डॉक्टरों का कहना है कि जब तक सुरक्षा एवं अन्य मांगें पूरी नहीं होती हैं तब तक वे लोग काम पर नहीं लौटेंगे।

एनआरएस अस्पताल में सोमवार को हुई इस घटना के विरोध में राज्यभर के करीब 4000 जूनियर और 60 हजार सीनियर डॉक्टर हड़ताल पर हैं। एनआरएस अस्पताल के मुख्य गेट पर ताला बंद है। इसके अलावा राज्य के अन्य अस्पतालों की ओपीडी बंद है। यहां तक की आपातकालीन सेवाएं भी ठप हैं। आंदोलनरत जूनियर डॉक्टरों के खिलाफ पुलिस ने मंगलवार रात को तीन प्राथमिकी दर्ज की हैं। इसमें गैर इरादतन हत्या की धारा भी लगाई गई है।

हड़ताली डॉक्टरों ने सुबह 9 से रात 9 बजे तक ओपीडी बंद रखने का ऐलान किया था, लेकिन अधिकतर अस्पतालों में रात 9 से सुबह 9 बजे के दौरान आपातकालीन सेवाएं भी बंद थीं। कई अस्पतालों के बाहर मरीजों के परिजनों ने जमकर हंगामा किया।

हड़ताल के बीच बुधवार को चिकित्सकों के आंदोलन का निर्मम रूप देखने को मिला। गंभीर रूप से बीमार छह माह का एक मासूम मां-बाप की गोद में दर्द से छटपटाता रहा। दम्पति चिकित्सकों के सामने हाथ जोड़े बच्चे के इलाज की मिन्नतें करता रहा, लेकिन उनका दिल नहीं पसीजा। 

बीरभूम के रहने वाले शेख नजरुल पत्नी के साथ बुधवार को छह माह के बच्चे को लेकर कोलकाता के एनआरएस अस्पताल पहुंचे। एक महीने पहले ही बच्चे के मलद्वार का ऑपरेशन इसी अस्पताल में हुआ था। ऑपरेशन के बाद बच्चे की हालत तत्काल सुधर गई थी, लेकिन अब दोबारा बिगड़ गई। बच्चा दर्द से परेशान था। दम्पति बच्चे को लेकर बुधवार सुबह अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि इमरजेंसी भी बंद है। आउटडोर भी बंद था। कोई चिकित्सकीय सेवा नहीं मिल रही थी। बुधवार को हड़ताल का दूसरा दिन था।

थक-हारकर वे आंदोलनरत जूनियर डॉक्टरों के पास पहुंचे। अबोध मासूम दर्द से लगातार बिलख रहा था। नजरुल ने आंदोलनरत चिकित्सकों से विनती करते हुए कहा कि साहब, मेरा बच्चा लगातार रोए जा रहा है। मलद्वार का हिस्सा फूलकर लाल हो गया है। इसकी चिकित्सा नहीं होगी तो पता नहीं बचेगा या नहीं, लेकिन धरती के भगवान कहे जाने वाले इन चिकित्सकों को दया नहीं आई। चिकित्सकों ने साफ कह दिया कि यहां कुछ नहीं हो सकता।

इसी तरह से कई अन्य रोगियों के साथ भी चिकित्सकों ने अमानवीय बर्ताव किया। हावड़ा के सिराजुल मोड़ल अपनी 14 वर्ष की बेटी को लेकर रविवार को एनआरएस अस्पताल पहुंचे थे। उसने गलती से कीटनाशक खा लिया था। उसे अस्पताल में भर्ती कर लिया गया, लेकिन उसके बाद से हुए हंगामे ने सब कुछ बदल दिया। वह अपनी बेटी से मिल भी नहीं पा रहे हैं। आंदोलनरत चिकित्सक उन्हें अंदर नहीं जाने दे रहे। सिर पर हाथ रखकर उन्होंने कहा कि पता नहीं बेटी किस हाल में है और क्या सोच रही होगी।

इसी तरह से ओवरब्रिज से गिरकर 12 वर्ष की इशिता मंडल का हाथ टूट गया है। वह भी अस्पताल में भर्ती है, लेकिन उसके पिता अर्द्धेंदु मंडल को चिकित्सकों ने बुलाकर साफ कर दिया कि यहां चिकित्सा नहीं होगी, आप इसे कहीं और ले जाइए। थक-हारकर बुधवार को वह अपनी बेटी को अस्पताल से कहीं और लेकर चले गए। इस तरह से सैकड़ों रोगी रोज परेशान होकर लौट रहे हैं।उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गृह के साथ ही स्वास्थ्य मंत्रालय भी संभाल रही हैं। चिकित्सकों के आंदोलन को लेकर राज्य सरकार ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

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